Monthly Archive: May 2016

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शहंशाह आलम का आत्मकथ्य

ख़ुद को जीते हुए एक आत्मकथ्य : ख़ुशी तो बची रहती है कुएँ के सन्नाटे तक में सच पूछिए तो मैं एक निहायत कम बोलने-बतियाने वाला, कम हँसोड़, कम ख़ुश रहने वाला और अपनी ज़िंदगी में ज़्यादा परेशान, ज़्यादा ग़मग़ीन, ज़्यादा ग़मज़दा रहने वाला आदमी हूँ। अब हर कोई अपनी...

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हेमन्त वशिष्ठ की कविता ‘आपकी क्या राय है’

” नहीं यार मैं नहीं पूछूंगा … मेरा मन नहीं मानता … ये उस टाइप का लगता ही नहीं है “… — ‘ ये कैसे कह दिया आपने ‘… “कभी बातें सुनी हैं आपने इसकी “… ‘ कभी … हां कभी कभी ही तो बोलता है … जाने कौन घमंड...

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मुझमें कुछ है जो आईना-सा है : परदे में छिपी आवाज़ को बाहर लातीं ग़ज़लें

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम भारतीय हिंदी ग़ज़लकारों में ध्रुव गुप्त बहुत ही इज़्ज़त और मुहब्बत से लिया जानेवाला नाम है। इसका मुख्य कारण ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हैं, जो पाठ के समय कुछ ऐसा अद्भुत समा बाँधती हैं, जैसे किसी बहती हुई नदी को आप बारिश के वक़्त देखते हैं। बारिश...

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सुबोध श्रीवास्तव की पांच कविताएं

आज भी आज फिर मचल गया देहरी पे पांव रखता नन्हा बच्चा। एक पल ठिठक कर कल मिली पिता की डांट याद करता है फिर, हौले से पुचकार कर ज़मीन पे रेंगते जहरीले कीड़े को- सूखे पेड़ के सुपुर्द करते हुए क्लास में टीचर के पढ़ाए सबक को कार्यरूप देता...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘चिकन’

” आज कुछ नॉन-वेज खाते हैं , स्वीटी । चिकन-शिकन हो जाए । ” बिस्तर पर अँगड़ाई लेते हुए रजिंदर बोला । ” आँख खुली नहीं जी और आपने फ़रमाइश कर दी । ले आना । बना दूँगी । ” बगल में लेटी सुमन बोली । प्यार से रजिंदर उसे...

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ऋचा साकल्ले की पांच कविताएं

 काश!  सूरज की जुबान होती काश सूरज की जुबान होती वो बताता हमको प्रकृति नहीं करती अंतर उसने दिया है सबको अपना-अपना वजूद वो बताता हमको इंसान की परिभाषा में जितना पुरुष है शामिल उतना स्त्री भी है शामिल न कोई प्रथम, न कोई द्वितीय दोनो अद्वितीय न कोई बड़ा,...

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नूर मुहम्मद ‘नूर’ की पांच कविताएं

अंधे और बटेर जब से अंधों के हाथ लगी है बटेर अंधे हरा – हरा हंस रहे हैं उन्हें चारों ओर बस हरा-हरा सूझ रहा है उनकी धृतराष्ट्र आंखों में नई सदी के हरे – हरे सपने हैं नक़्शे हैं लगातार बजाते हुए ताली और करते हुए जुगाली वे पतझड़...

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मिहिर कुमार की पांच कविताएं

जिंदगी की किस्त…. वो लम्हे जो चुरा रखे हैं मैंने तुम्हारे साथ के, तुम्हारे पास के चंद कतरे तुम्हारी यादों के कुछ उजाले तुम्हारी मुस्कुराहट के जिन्हें मैंने बहुत अंदर सीने में छिपाए रखा दुनिया की नजरों से बचाये रखा हर सुबह मैं तुमको थोड़ा याद करता हूं हर रोज़...

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इस संसार को देखने की समझ देती कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम हर कवि अपने समय को गहराई में जाकर सुनता है, तब अपने सुने हुए समय को एकदम विलक्षण प्रकट करता है। सच्चाई यही है, कवि के समय में जो कुछ घटित हुआ होता है, हर कवि उसी घटे हुए के प्रभाव में होता हुआ ख़ुद को रचनारत...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की लघु कथा ‘स्मार्ट फैमिली, स्मार्ट ज़िन्दगी’

डिनर का वक्त परिवार का वक्त होता है। यही वक्त होता है जब परिवार के सारे सदस्य एक साथ मौजूद होते हैं अपने अपने मोबाइल के साथ। सब साथ होते हैं लेकिन कोई किसी की तरफ ठीक से देखता नहीं। मम्मी अपनी फोटो पर लगातार आ रही लाइक की संख्या...

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श्वेता शेखर की पांच कविताएं

खिलखिलाते हैं मुखौटे समय के हिसाब से हमेशा चलता है हमारे साथ एक मुखौटा हम ठीक ठीक नहीं पहचानते समय की नब्ज को पर मुखौटा बड़ी तेजी और नजाकत के पहचान लेता है समय को अंदर जाने कितने ही हो रंग पर बाहर दिखता है सभी मुखौटा सभ्य, शालीन और...

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राज्यवर्द्धन की चार कविताएं

छठ मइया तुम्हें सलामत रखें! एक दीप हर दीपावली में तुम्हारे नाम का आज भी जला आती हूँ – छत पर   रास्ता दिखाने तुम्हारे हृदय तरंगों को पता नहीं कब आ जाये भूले भटके   आज भी तो हिचकी आई थी खाते खाते कहा माँ ने कि कोई याद...

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कथाकार कपिल आर्य का सम्मान

‘सहज व्यक्तित्व वाले कपिल आर्य ने अपने लेखन और संगठनात्मक कार्य से सभी पीढ़ियों को प्रभावित किया  है’ ये कहना है प्रबुद्ध आलोचक-संपादक डॉ श्रीनिवास शर्मा का। मौका था पश्चिम बंगाल प्रगतिशील लेखक  संघ के अध्यक्ष और कथाकार कपिल आर्य के सम्मान का। सम्मान समारोह का आयोजन 7 मई को...

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सुशांत सुप्रिय की 5 कविताएं

  1. उल्टा-पुल्टा मैं परीक्षा पास करता हूँ मुझे डिग्री मिल जाती है मैं इंटरव्यू देने जाता हूँ मुझे नौकरी मिल जाती है और तब जा कर मुझे पता चलता है कि दरअसल नौकरी ने मुझे पा लिया है 2. सूर्य के तीसरे ग्रह पर न गिला न शिकवा न...

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हेमन्त वशिष्ठ की कविता ‘आधी बची है रात ‘

कविता : हेमन्त वशिष्ठ फोटो : पंकज जैन   एक लफ्ज़ भिजवाया है … ढलती शाम के साथ… लिख रहा हूं बाकी पयाम… अभी आधी बची है रात… हर पहर से इकरार है इंतज़ार का … आहिस्ता आहिस्ता… हर लम्हा चुन रहा है अल्फाज़… एक लफ्ज़ भिजवाया है … ढलती...

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निराला की कविता का विस्तार -‘‘राजा की दुनिया’’

अमीरचंद वैश्य बुद्धिलाल पाल पुलिस विभाग में उच्चपद पर सेवारत है। ऐसी अवस्था में व्यवस्था की आलोचना करते समय उन्हें सघन अन्तद्र्वन्द्व का तनाव झेलना पड़ता होगा। फिर भी उन्होंने साहस किया है। ‘राजा की दुनिया’ से साक्षात्कार करवाके वर्तमान क्रूर व्यवस्था की सटीक आलोचना की है। मुक्तिबोध के बहुप्रयुक्त...

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एक अच्छी दुनिया का मतलब समझाती कविताएं

शहंशाह आलम कविता का मतलब प्रार्थना के शब्द नहीं होते। मेरा मानना है कि कोई कवि जैसे ही अपनी कविता को प्रार्थना का माध्यम बना लेता है, कविता की मृत्यु उसी क्षण हो जाती है। इसलिए कि कविता-लेखन का अर्थ यह तो क़तई नहीं है कि कवि अपने आस-पास की...

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राजकिशोर राजन की चार कविताएं

राजकिशोर राजन हाय रे भदेस ऊपर देखो …….. ऊपर और ऊपर यह वक्त ही ऊपर-झापर देखने का है सोचो चाहे जो कुछ उचारो, सन्मार्ग की बात लिखो, भाषा में अष्टावक्र विचार भले उसका अर्थ हमारे समय के पाणिनी भी न समझ पाएं रंग दो, पूरे का पूरा रंग दो जितना...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘एक गुम-सी चोट’

सुशांत सुप्रिय कैसा समय है यह जब बौने लोग डाल रहे हैं लम्बी परछाइयाँ — ( अपनी ही डायरी से ) —————————————————————————————- बचपन में मुझे ऊँचाई से , अँधेरे से , छिपकली से , तिलचट्टे से और आवारा कुत्तों से बहुत डर लगता था । उन्हें देखते ही मैं छिप...

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सुशील कुमार की दस कविताएं

सुशील कुमार 1. कबसे जगा हूँ जब से जगा हूँ तब से सोया हूँ कब से सोया हूँ तब से कि जब से जगा हूँ ● 2. कोई न कोई तार जीवन का कोई न कोई राग वीणा का छूट ही जाता है रचता हूँ जब भी कोई जीवन-गीत, कहीं...