Monthly Archive: June 2016

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यशपाल निर्मल की दो लघुकथाएं

गर्व   ” घर में कोई है क्या?” सरपंच अवतार सिंह ने आवाज़ लगाई ही थी कि फकीर चंद  दौड़ते हुए दरवाज़े पर पहुँचा । उसने भय और घबराहट से कहा,” मालिक आपने क्यों कष्ट किया? मुझे बुला लेते। ” “क्यों फकीर चंद, हम तुम्हारे घर भी नहीं आ सकते...

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तलवार की धार पर खरबूजे की तरह रखी दुनिया में आप कैसे सो सकते हैं

अरविंद श्रीवास्तव ’तुम्हें सोने नहीं देगी’ सरला माहेश्वरी की दूसरी काव्य-कृति है।  संग्रह की तमाम कविताएं साम्राज्यवादी सामंती सोच को बेनकाब करती है। ये कविताएं जहाँ आदमी में धंस रही जड़ता, अकर्मण्यता एवं लिज़लिजेपन को झकझोरती हैं वहीं सत्ता को और अधिक मानवीय बनाने की बात करती है। नई सदी...

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भारती की दो कविताएं

जिंदगी तेरा पता … पूछना है इस शाम के आँचल में छूपते सूरज से इस निर्मम कठोर रेगिस्तान की निर्दयी ख़ूबसूरती से उजाड़ बियाबान से चीड़ देवदार के पेड़ों से इस नीले समन्दर में हिलोरें मारती उन्मुक्त लहरों से उफनती मचलती नदी से इस अभिमानी सागर में उठते ज्वार से...

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मुहम्मद अबयज़ ख़ान की दो नज़्म

ज़िक्र तुझपे फ़क्र भी है तेरा ज़िक्र भी है तुझसे इश्क़ भी है तेरी फ़िक्र भी है तुझपे रश्क़ भी है कश्मकश भी है तू रफ़ीक़ भी है तू अज़ीज़ भी है तू सुबह सुबह है तू शाम सी है तेरी खुशबुएँ हैं तेरी महक सी है तेरी लज़्ज़तें हैं...

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गौरव भारती की दो कविताएं

1. मैं भूखा ….. तुम भी भूखे हो , आओ ,आओ मिलकर भूख मिटायें, इक -दूजे को नोचें खाएं | नहीं खा सके इक -दूजे को ? क्यों न सियासी पेंच लगाएं , बहुत सीखा है इतिहास से हमने , नुस्खा क्यों न वही आजमायें | चलो खेलते हैं  एक...

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परितोष कुमार ‘पीयूष’ की दो कविताएं

शहरीकरण जब हो रहा था गावों का शहरीकरण बिछाए जा रहे थे कंक्रीट मुनाफों के गोदाम से ला-लाकर जब झोपड़ियों को उजाड़-उजाड़ कर बन रहे थे जानलेवा फ्लाईओवर दी जा रही थी आहुति प्रकृति की परियोजनाओं के धधकते हवनकुंड में, आधुनिकता के नाम पर उस समय फटेहाली का मारा एक...

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‘सड़क पर ज़िंदगी’: मनुष्य-जीवन के संघर्ष-काल को कमाल का शब्द देती कविताएं

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम यह सच है कि आदमी के जीवन का संघर्ष रहस्यों से भरा रहता है। ये संघर्ष-रहस्य आदमी के जीवन में चुपचाप चले नहीं आए हैं। मेरे ख़्याल से पूरी चालाकी से दुनिया भर के पूँजीवादियों ने और दुनिया भर की अमीर, क्रूर, दंभी सरकारों ने आदमी के...

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बी आर विप्लवी की रचना प्रक्रिया : आदमियत का आरजूनामा

राजकिशोर राजन मानवता का दर्द लिखेंगे माटी की बू-बास लिखेंगे हम अपने इस कालखंड का एक नया इतिहास लिखेंगे जब मैं अपने समय के एक महत्वपूर्ण गजलकार बी.आर.विप्लवी के रचना कर्म से गुजर रहा था तो अदम गोंडवी की ये पंक्तियाँ रह-रह कौंध जा रही थी। कारण कि विप्लवी जी...

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डॉ संध्या तिवारी की लघु कथा ‘ठेंगा’

उसके आगे तंगी हमेशा मुंह बाए खड़ी रहती थी लेकिन देह को धंधे के लिये उपयोग में लाना उसे कभी मंजूर न था लेकिन गरीबी कैसे दूर की जाये इस का उपाय वह खोजती ही रहती थी। इसी क्रम में किसी ने उसे बताया , कि वह गुरुवार का व्रत...

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जंतर तो है पर मंतर अब काम नहीं करता

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव दिल्ली होने का मतलब क्या है? सत्ता का केंद्र? ताक़त और पॉवर का गलियारा या इसी सत्ता के लिए बार-बार रक्तरंजित होने वाली एक बेबस-लाचार नगरी? या फिर बार-बार उजड़ कर बस जाने के हौसले का नाम है दिल्ली? अगर ये हौसले का नाम है तो फिर...

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विभूति कुमार मिश्र की पांच कविताएं

एक झूठी बातों से बहलाना ना हो सके तो कड़वे सच से रुला देना आंसुओं में सब निकल जायेगा जिसे पत्थर समझती हो मोम है,पिघल जायेगा। झूठ से परत पड़ेगी जिद्दी मोम पत्थर में बदल जाएगा। दो पुत्र माँ के हृदय की बराबरी कई जन्मों में नहीं कर सकता। वो...

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राज्यवर्द्धन की चार कविताएं

पक्ष जो लेखक,कलाकार,वैज्ञानिक,अधिकारी उद्योगपति एवं बुद्धिजीवी हिन्दू हैं और हमारे पक्ष में नहीं हैं वे कम्युनिस्ट हैं या फिर दरबारी हैं कांग्रेस के …और जो मुस्लिम हैं हमारे पक्ष में नहीं हैं वे पाकिस्तानी हैं सिर्फ मेरी ही विचारधारा देश की सभ्यता से जुड़ी है पवित्र है देश की संस्कृति...

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निर्मल गुप्ता की दो कविताएं

संवाद का पुल मैं लिखा करता था अपने पिता को ख़त जब मैं होता था उद्विग्न ,व्यथित या फिर बहुत उदास जब मुझे दिखाई देती थीं अपनी राह में बिछी नागफनी ही नागफनी यहाँ से वहां तक। मेरा बेटा मुझे कभी ख़त नहीं लिखता फ़ोन ही करता है केवल उसकी...

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स्मृतियां और शुभेच्छाएं नहीं मानतीं ‘सरहदें’

 पुस्तक समीक्षा ऋषभदेव शर्मा सुबोध श्रीवास्तव  कविता, गीत, गज़ल, दोहे, मुक्तक, कहानी, व्यंग्य, निबंध, रिपोर्ताज और बाल साहित्य जैसी विविध साहित्यिक विधाओं में दखल रखने वाले बहुआयामी प्रतिभा के धनी कलमकार है। पत्रकारीय लेखन के अतिरिक्त वे अपने काव्य संग्रह ‘पीढ़ी का दर्द’, लघुकथा संग्रह ‘ईर्ष्या’, बालकथा संग्रह ‘शेरनी माँ’...

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मुद्राराक्षस की कहानी ‘नाश्ते से पहले’

सुबह जब सीता नाश्ता करने बैठी तो उसने देखा कि उसका बाबा हँसिया लेकर कहीं बाहर जा रहा है। ताज्जुब से सीता ने माँ को टोका, “माँ, बाबा इस वक्त हँसिया लेकर कहाँ जा रहे हैं ?” “बाड़े में जा रहे हैं।” माँ ने जवाब दिया, “सूअर ने कल राते में...

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शिवदयाल की तीन कविताएं

वार वे/पहले मारते हैं शब्दों से, जुमलों से गोदते हैं पहले-पहल जैसे – गद्दार ! तब करते हैं खंजरों-तमंचों से वार …! मालूम है इन्हें कि अगर कहीं खाली भी जाये वार खंजर का तब भी शब्द अपना काम करते रहेंगे ….. एक पूरा, मुकम्मिल इंतजाम है यह चाँदमारी का...

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नूर मुहम्मद ‘नूर’ की पांच ग़ज़लें

एक और कब तक लहू जलाऊं मैं और कितनी ग़ज़ल सुनाऊं मैं तीरगी सुनके, मुस्कुराती है नग़्म-ए-नूर गुनगुनाऊं मैं याद रहते हैं दर्दोग़म उसके दर्द अपना ही भूल जाऊं मैं जादु-ए-लफ्ज़, बेअसर बेजां फिर भी जादू यही जगाऊं मैं नूर उसको , न भूल पाऊंगां काश! उसको ,जो याद आऊं...

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सुषमा सिन्हा की दो कविताएं

रखवाला तुम्हारी याद परती जमीन पर गाड़ा हुआ हो जैसे एक डंडा बताता हुआ मुझे- ‘यह जीवन है तुम्हारा खुद अपनी इच्छाओं के अनुसार जीने का अधिकार है तुम्हारा हंसने, बोलने, गाने की स्वतंत्रता है तुम्हारी धूप, हवा, पानी का अधिकार है तुम्हारा’ अनवरत समझाता-बुझाता उस डंडे पर दिखने लगता...

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वर्तमान को राह दिखाती कविताएं

पुस्तक समीक्षा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव  ‘कट रहे वन-उपवन बना जीवन विजन। सुख-शांति के आगार बने कारागार साकार बने निर्जन’’ शहर की लपलपाती जीभ अपनी सीमा का अतिक्रमण कर खेत-खलिहान-जंगलों को लगातार निगल रही है। वो हर कुछ खा जाना चाहती है। वो खेत-खलिहानों को मॉल में बदल देना चाहती है।...

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उमेश कुमार राय की दो कविताएं

सपना देख रहा हूं मैं बदल रहा है देश छू रहा है विकास के नये आयाम गरीबी का कहीं कोई नामोनिशां नहीं माँ-बहन-बच्चों के शरीर पर पूरे वस्त्र बच्चा नहीं तरसता बचपन को बूढ़े नहीं तड़पते तीमारदारी को महफूज हैं माँ-बहनें घर में भी बाहर भी, उन्हें डर नहीं निर्भया...