Monthly Archive: June 2016

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‘रेजाणी पानी’ : इस पूरे समय की अंतर्व्याधि प्रकट करती कविताएँ

पुस्तक समीक्षा शहंशाह आलम समकालीन हिंदी कविता की स्वरलहरियाँ ऐसी हैं, जैसे हम पेड़ों के हरे पत्तों से जगमग किसी प्रदेश से गुज़रते हुए उन पेड़ों का जो संगीत कानों को सुनाई दे और मंत्रमुग्ध हम उसी पेड़ों के अनुभवों से भरे प्रदेश का होकर रह जाने के एहसास से...

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य़थार्थ और भ्रम के बीच हमारी ‘सैराट’

ऋचा साकल्ले सोशल मीडिया पर नागराज मंज़ुले की मराठी फिल्म सैराट की इतनी चर्चा है कि देखने के लिेए मन मचल गया। यू ट्यूब पर जो मिली उसकी क्वालिटी मन मुताबिक़ नहीं थी, फिल्म नोएडा के पीवीआर से हट चुकी थी…सोचा क्या करुं…मयंक सक्सेना से मुंबई बात हुई उसने कहा...

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सुशांत सुप्रिय की पांच कविताएं

माँ , अब मैं समझ गया मेरी माँ बचपन में मुझे एक राजकुमारी का क़िस्सा सुनाती थी राजकुमारी पढ़ने-लिखने घुड़सवारी , तीरंदाज़ी सब में बेहद तेज़ थी वह शास्त्रार्थ में बड़े-बड़े पंडितों को हरा देती थी घुड़दौड़ के सभी मुक़ाबले वही जीतती थी तीरंदाज़ी में उसे केवल ‘ चिड़िया की...

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मनु स्वामी की दस कविताएं

पहाड़ गोमुख तक जा पहुँचा है शहर दरकने लगे हैं घबराकर पहाड़। * * * * * बसन्त भी लौट रहा है क्या पहाड़ भेजेंगे ठंडी हवा? वे तो खुद तप रहे हैं नंगे होकर। * * * * * नमकीन लगा इस बार गंगा का स्वाद रो तो नहीं...

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अरविंद श्रीवास्तव की पांच कविताएं

लाल मिर्च और हमारा प्रेम और इस संताप को भी आत्मा ने आत्मसात कर लिया था अंततः परिणाम सुखद और आनंदमयी सन्निकट थे एक सुन्दर समय उत्सव के ढेर सारे अवसर साथ लाता है लाख मनाही के बावजूद प्रेम और घातक विचारों से सराबोर होता है मिर्च-से सुर्ख रंगों में...

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सुशील कुमार की पांच कविताएं

1. हृदय में न जाने कितनी कविता जन्मते ही मर गई ! कभी कंठ फूटा नहीं अफ़सोस,  हर बार वह अजन्मा ही रही ● 2. एक शून्य से बड़ा नहीं है ब्रह्मांड न एक बूंद से अधिक महासागर एक न एक दिन यौगिक टूटकर तत्व में विलीन हो जाता है...