Monthly Archive: July 2016

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इस निपात समय को जवान बरगद का पेड़ सौंपते कवि की कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम सुल्तान अहमद समकालीन कविता के वैसे कवियों में शुमार किए जाते रहे हैं, जिनकी कविताएँ हमारे समय की अवनति को, ह्रास को, अध:पतन को को चिह्नित करके जवान, हरियल, उन्नति से भरे पत्ते फागुन और चैत माह को सौंपते रहे हैं। यानी जिस माह में सभी वृक्षों...

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स्मिता सिन्हा की तीन कविताएं

1. आलसी सी पड़ी उबासियों में जब जीवन ऊंघता है बंद आँखों में वह गढ़ती है कुछ रेखाचित्र जैसे लाल फूलों वाला एक पेड़ अमलतास दूर तक बिछी कोमल हरी दूब दूध से चमकते बादल जो पहुँचते हों सीधे चाँद तक गीली गीली सी बारिश की कुछ बूँदें और ऐसा...

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महाश्वेता देवी की याद में एक कविता

रजनीश बाबा मेहता तू नहीं तेरी सौगात मेरे ज़ेहन में जिंदा रहेगी तू है अब अग्निगर्भ में, मनीष-धारित्रि पुत्री रहेगी ।। मौत के उम्रकैद में, कृष्ण द्वादशी के देश में मातृछवि की छांव में, अमृत संचय लिए तू जिंदा रहेगी ।। क्लांत कौरव के काल में, अग्निशिखा की गाल में...

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महाश्वेता देवी का जीवन और साहित्य

कृपाशंकर चौबे चौदह जनवरी 1926 को ब्रह्म मुहूर्त में, ढाका के जिंदाबहार लेन में जिस शिशु का जन्म हुआ, उसकी मौजूदा परिणति स्वाभाविक है। महाश्वेता देवी के जन्म के समय माँ धरित्री देवी मायके में थीं। माँ की उम्र तब 18 वर्ष और पिता मनीष घटक की 25 वर्ष थी।...

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वीणा भाटिया की दो बाल कविताएं

रसगुल्ले के पैसे लाओ   चिड़ियों ने बाजार लगाया कौआ चौकीदार बिठाया। मेले में जब भालू आया उठा एक रसगुल्ला खाया। गौरैया यह कह मुस्काई कहां चल दिए भालू भाई। जल्दी क्या है रुक भी जाओ रसगुल्ले के पैसे लाओ। भालू बोला क्या फरमाया मुझको क्या जान न पाया। मंत्री...

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गोपाल प्रसाद की दो कविताएं

ग़ालिब गूंगे और बलबलाते लोगों के बीच एक जीभ वाला राजा था अपने खजानों और तहखानों में वक्रोक्तियों को सिर्फ़ छिपाए ही नहीं रहा वो दुनिया को बांटता रहा वक्त बेवक्त एक बहुत बड़ी भीड़ से उगा था वह और सारी जिंदगी खुद को उसी से जोड़ता काटता रहा सतह...

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नन्दना पंकज की दो कविताएं

बंदिनी का संशय अब जबकि तुम लगातार लिख रहे हो मेरे लिये प्रेम और मुक्ति की कविताएँ, मेरी सुप्त जिजीविषा को जगाते हुए, दिखा रहे हो सपने उन्मुक्त आकाश के, भर रहे हो नस-नस में विद्रोह की चिंगारियाँ, और तुम्हारे भावपूर्ण शब्दों के स्रोत से अद् भुत ऊर्जा जुटाकर मैं...

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बेटा, बेटी और बख्शीश

शैलेंद्र सिंह ऑपरेशन थिएटर में ऑपरेशन चल रहा है , बाहर परिजन आशंकित है | ऐसे में कोई आ के कह दे, जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं तो, चेहरे खिल उठते हैं | परिजन अब लालायित हैं ये जानने के लिए कि  लड़का है या लड़की | ओ० टी०के...

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सेवा सदन प्रसाद की तीन लघुकथाएं

गुमशुदा इंसान एक आदमी पागल की तरह सड़क पर दौड़ रहा था। ट्राफिक पुलिस ने डपट कर कहा — “अरे! पागल है क्या ? बार – बार सड़क पे दौड़ रहा है – – क्या ढूंढ रहा है  ?।” ” इंसान ढूंढ रहा हूं ” पागल ने याचना भरे शब्दों...

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संजीव ठाकुर की पांच कविताएं

प्यासा हथेलियों में दम कहाँ उठा पाने की एक बूँद खुशी ?   और फिर भोजन भी तो चाहिए अंधे कुएं को ! क्या तुम जानते हो — मेरे शरीर का हरेक रंध्र एक –एक कुआँ है बहुत गहरा बहुत प्यासा चट विलीन हो जाती है बमुश्किल मिली एक बूँद...

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सरला माहेश्वरी की पांच कविताएं

डरना मना है मत कहो कि तुम्हें ये सब देखकर लगता है डर मत कहो कि तुम्हें कुछ कहते लगता है डर मत कहो कि तुम्हें कुछ लिखते कुछ सोचते कुछ खाते कुछ पहनते प्रेम करते इस तरह मरते लगता है डर यह काम का समय है विकास का समय...

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परितोष कुमार ‘पीयूष’ की दो कविताएं

इंसानी शक्ल वाले गिद्ध नन्हें कदमों से परचून की दूकान जाते वक्त जब वो खींच ली गई होगी सड़क किनारे से खर-पतवारों के बीच सूनसान जंगली खेतों में कितनी छटपटाई होगी कितनी मिन्नतें माँगी होगी कैसा लगा होगा उसे जब उसका सुनने वाला कोई नहीं होगा उसकी अपनी ही आवाज...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘बंटवारा’

मेरा शरीर सड़क पर पड़ा था । माथे पर चोट का निशान था । क़मीज़ पर ख़ून के छींटे थे । मेरे चारो ओर भीड़ जमा थी । भीड़ उत्तेजित थी । देखते-ही-देखते भीड़ दो हिस्सों में बँट गई । एक हिस्सा मुझे हिंदू बता रहा था । केसरिया झंडे...

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मनोज कुमार झा की कविता ‘घर नहीं है’

जिसका कोई घर नहीं उसका भी होता है एक घर   लाखों बरस पहले इंसान ने बनाया घर गुफाओं, कंदराओं में और चित्रांकित कर दिया   इस इक्कीसवीं सदी में जब न जाने कैसे-कैसे हैं घर इंडिया में ‘एंटीलिया’…   धर्मराज युधिष्ठिर से लेकर शाहजहां, रंगीलेशाह और अब आधुनिक शासकों...

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आनन्द गुप्ता की पांच कविताएं

रोता हुआ बच्चा यह आधी रात का समय है जब सारे खाए पीए अघाए लोग अपने दड़बों में चैन की नींद सोए हैं सड़क के पार एक बच्चा लगातार रोए जा रहा है रोते हुए बच्चे की भूख मकानों से बार-बार टकराकर घायल हो गिर रही है जमीन पर यह...

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सुशांत सुप्रिय की तीन कविताएं

माँ इस धरती पर अपने शहर में मैं एक उपेक्षित उपन्यास के बीच में एक छोटे-से शब्द-सा आया वह उपन्यास एक ऊँचा पहाड़ था मैं जिसकी तलहटी में बसा एक छोटा-सा गाँव था वह उपन्यास एक लम्बी नदी था मैं जिसके बीच में स्थित एक सिमटा हुआ द्वीप था वह...

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राज्यवर्द्धन की तीन कविताएं

फूल फूल अच्छे लगते हैं लेकिन वे जो निषेचित होकर बनते हैं – फल देते हैं –अन्न सुरक्षित रहता है – बीज भविष्य की यात्रा के लिए कैसे कहूँ उस फूल को सुंदर जो बिना कुछ दिए अभिशप्त होते हैं – झड़ने को । पेड़ जब हम अपनी हवस में...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पांच ग़ज़लें

एक धीरे धीरे ही सही बदल रहा हूं मैं दुनिया के सांचे में ढल रहा हूं मैं। सिसकती है रात, सिसकती रहे सुबह के लिए मचल रहा हूं मैं। अंधेरे के बाद उजाला ही आएगा उम्मीद झूठी है, उछल रहा हूं मैं। इंसां था, जाने कब सांप बन गया आदमी...

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अबयज़ ख़ान की ग़ज़ल

बेवजह नहीं दीवार पे इल्ज़ाम लिखे हैं हमने तो बस मंज़र ए आम लिखे हैं तुमने पैदा की है हिन्दू मुसलमा की खाई शहर शहर नफ़रतों के इश्तेहार लिखे हैं तुम्हारी शफकतों के तलबगार नहीं हम ख़ुदा ने किस्मत में बहुत इनाम लिखे हैं हमारी वफ़ादारियों पर शक ना करो...

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 वीणा भाटिया की तीन कविताएं

वसीयत साहित्यकार की शब्दों के भंडार कलमें जो हैं चार कुछ पेपर सफ़ेद एक टेबल-कुर्सी खूंटी पर टंगी हुई जर्सी   क्या लिखूँ वसीयत इसकी किसे ज़रूरत है मार्क्स-लेनिन की कौन समझेगा टैगोर-निराला-गोरख की लेखनी कोई नहीं जानना चाहता समाजवाद धीरे-धीरे आए, काले-काले अच्छर चम्पा है चीन्हती राग दरबारी का...