Monthly Archive: July 2016

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शहंशाह आलम की पांच कविताएं

तब भी मैं द्वार जो खुल रहा है प्राचीन का इस द्वार के भीतर असंख्य प्राचीन तोते प्रेम कर रहे हैं अपने प्राचीन तरीक़े से अंतहीन बार प्रेम की सहजता को बचाए आप कहना चाहें तो कह दें मेरे बारे में कि प्रेम को लेकर यह आदमी हमेशा से किसी...

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‘ऐनुल’ बरौलीवी की दो ग़ज़लें

एक राहबर माहिर     हमें मिलता नहीं क्यूँ इनायत     यार भी करता नहीं नाम तेरा हो गया     बदनाम अब आजकल तू   नेक़ियाँ करता नहीं आज जो भी हौसला था मिट गया क्या करें अब ज़ख़्म ये भरता नहीं नफ़रतों की आँधियों से आज क्यूँ आशियाना प्यार का बसता नहीं मौत आएगी       ...

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नंदना पंकज की कविता ‘कौवे की व्यथा’

मैंने तिनका- तिनका चुना बड़े जतन से घोंसला बुना अपना संसार बसाया दे अंडे परिवार बढ़ाया तन का गर्मी दे सेती रही माँ की ममता देती रही कवच तोड़ चूजे निकल आये मैं रही कलेजे से लगाये अपनी चोंच से खिलाया निवाला आँखों के तारों सा पाला धूप, बारिश, तूफान...

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स्मिता सिन्हा की कविता ‘मैं गिर रही हूं’

कविता कहती है अक्सर सुनो तुम मुझको सुनो बताओ मैं कहाँ हूँ उन कुछ बुने चुने से शब्दों में या कि उन खूबसूरत ख्यालों हसरतों में उन आकाशगंगाओ में या कि कुछ कोमल उपमाओं में बताओ मैं कहाँ हूँ कहाँ है वह चुभती सी जमीं वह जलता सा आसमां क्यों...

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रंजीत राज की तीन कविताएं

दर्द से रिश्ते दर्द से रिश्ते कुछ ऐसे बने मेरे कुछ टूट गये कोरे सपने मेरे यही तो मेरी जमा-पूँजी है खाली आसमाँ खाली-खाली जमीं है दर्द सहना है चुप ही रहना है मैं कवि हूँ जब तक जीना है पल-पल मरना है पीड़ाओं का मुकुट किसे दिखलाऊँ समंदर दुविधाओं...

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अनिरुद्ध सिन्हा की चार ग़ज़लें

एक आपसे  और  न ग़ैरों से  गिला रहता है दर्द की धूप में  साया  भी खफ़ा रहता है नींद इस सोच से आई न कभी भी मुझको ख़्वाब आँखों की सियासत से ज़ुदा रहता है बात  अपनी मैं  कोई तुझसे कहूँ  तो कैसे तेरे  भीतर तो  कोई  और  छुपा  रहता...

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शिवदयाल की लंबी कविता ‘अंत, अंत हे गर्दनीबाग!’

इस वसंत अंतिम बार फुलाया है सेमल सुग्गों-कठफोड़वों की अंतिम चहचहाहट है यह सेमल के फूलों की लाल-लाल लहलहाहट में कैसे लहालोट हो रहे हैं पंछी – अंतिम बार, अंतिम बार! पुटुस की झाड़ियों की खटतूरस गंध अब हमेशा -हमेशा के लिए शेष होने वाली है न मालूम रंगबदलू गिरगिटान अब कहाँ...

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आदमी की दुनिया को विस्तार देतीं अनिरुद्ध सिन्हा की ग़ज़लें

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम समकालीन हिंदी साहित्य में ग़ज़ल का प्रभाव बढ़ा है, क़द बढ़ा है, स्वीकृति का दायरा बढ़ा है। ग़ज़ल के लिए इस सर्वव्यापकता के पीछे जिन महत्वपूर्ण ग़ज़लकारों का सद्प्रयास रहा है, उनमें समकालीन ग़ज़ल के चर्चित शायर अनिरुद्ध सिन्हा की भूमिका जानी बूझी हुई है। इसलिए कि...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कविता ‘रोटियों के हादसे’

एक मरियल कुत्ता और एक मरियल आदमी कूड़ेदान में पड़ी एक सूखी रोटी के लिए झगड़ पड़े। कुत्ते ने कहा– मैंने देखा है पहले हक मेरा बनता है। आदमी चिल्लाया–नहीं! नहीं कर सकते तुम उल्लंघन मानवाधिकारों का रोटी पहले मैंने देखी है इस पर मेरा अधिकार बनता है। आदमी ने...

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संदीप श्याम शर्मा की दो कविताएं

आज मुक्त हूँ मैं ज़ीर्ण-शीर्ण, क्षत-विक्षत, जैसा भी हूँ, आगम-निगम से आज मुक्त हूँ मैं । गूढ़-मूढ़, घायल-आहत, जैसा भी हूँ, आसक्त-विरक्त से आज मुक्त हूँ मैं । निर्धन-निर्बल, विषय-विरक्त, जैसा भी हूँ, विस्मय-निर्णय से आज मुक्त हूँ मैं । लुप्त-रिक्त, खिन्न-भिन्न, जैसा भी हूँ, आदि-अंत से आज मुक्त हूँ...

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सुशांत सुप्रिय की दो कविताएं

एक जलता हुआ दृश्य वह एक जलता हुआ दृश्य था वह मध्य-काल था या 1947 1984 था या 1992 या वह 2002 था यह ठीक से पता नहीं चलता था शायद वह प्रागैतिहासिक काल से अब तक के सभी जलते हुए दृश्यों का निचोड़ था उस दृश्य के भीतर हर...

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रामावतार सागर की दो ग़ज़लें

एक सोच के साये टूटे होंगे तब जाकर वो रूठे होंगे पनघट पर देखे सपनों के गागर घर पर फूटे होंगे किससे जाकर कहता बीती घर अपनो ने लूटे होंगे नफरत की बेलों पर यारों झगड़ों के ही बूटे  होंगे अब जाकर सागर छलका है बंध नदी के टूटे होंगें...