Monthly Archive: August 2016

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सुधांशु गुप्त की कहानी ‘सामान के बीच रखा पियानो’

दोपहर के चार…साढ़े चार या पांच बजे हैं। अक्तूबर का महीना है। 8….9 या 10 तारीख। उसने अपने घर में प्रवेश किया है। घर में व्हाइट वाश और पेंट का काम चल रहा है। बड़ा बेटा अभी काॅलेज से नहीं आया है और छोटा बेटा स्कूल से आकर ट्यूशन जा...

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हमारे समय के अँधेरे को रौशन करनेवाले शायर इब्राहीम ‘अश्क’ का ‘सरमाया’

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम इब्राहीम ‘अश्क’ की पहचान उन शायरों में है, जिनका गहरा ताल्लुक़ फ़िल्मी दुनिया से है। ‘कहो न प्यार है’, ‘कोई मिल गया’, ‘कृश’, ‘दस कहानियाँ’, ‘वेलकम’, ‘ब्लैक एण्ड व्हाइट’, ‘जाँनशीन’, ‘कोई मेरे दिल से पूछे’, ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’ आदि कितनी ही फ़िल्में हैं, जो...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘हमला’

बाईसवीं सदी में एक दिन देश में ग़ज़ब हो गया । सुबह लोग सो कर उठे तो देखा कि चारो ओर तितलियाँ ही तितलियाँ हैं । गाँवों , क़स्बों , शहरों , महानगरों में जिधर देखो उधर तितलियाँ ही तितलियाँ थीं । घरों में तितलियाँ थीं । बाज़ारों में तितलियाँ...

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विहाग वैभव की पांच कविताएं

माँ का सिंगारदान हर जवान लड़के की याद में बचपन सर्दियों के मौसम में उठता गर्म भाप सा नहीं होता रेत की कार में बैठा हुआ लड़का गुम गया मड़ई की हवेली में हमारे प्रिय खेलों में सबसे अजीब खेल था माँ के सिंगारदान में उलट-पलट , इधर-उधर जिसमें रहती...

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एस एस पंवार की पांच कविताएं

मेरे शब्द घायल हैं मेरे शब्द घायल हैं पिछले कई रोज से मेरे पास नहीं बची अब कोई भी शुद्धतम कविता मैं घसीटता हूँ कलम यूँ ही बस औंधे मुँह लेटकर मैं प्रलाप लिखता हूँ कभी-कभी तुम्हारे चले जाने का, सिसकियाँ लिखता हूँ कभी जो लेती थी तुम मेरे सीने...

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संजीव ठाकुर की पांच बाल-कविताएं

रोज रात           रोज रात घर के बाहर भौंका करते हैं कुत्ते कहते हैं पहनेंगे हम भी तेरे जैसे जूते ठंड सताती है हमको पहरेदारी करने में तुम्हें मजा तो आता होगा घर के भीतर रहने में ? रोज रात घर के भीतर चूँ –चूँ करते...

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‘ऐनुल’ बरौलीवी की दो ग़ज़लें

 एक ज़िन्दगी में दिल लगाना सीखिये दीप उल्फ़त के जलाना सीखिये नफ़रतें दिल के कभी ना पास हों प्यार का दरिया बहाना सीखिये दोस्ती ही प्यार का इक नाम है दूसरों के ग़म उठाना सीखिये हौसले से मुश्क़िलों को जीतकर ज़िन्दगी में मुस्कुराना सीखिये हौसले हों ज़िन्दगी में कम नहीं...

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श्रुति फौगाट की कविता ‘लम्हे’

कभी यूँ हुआ था कि सोचा था वक़्त को गुज़रने ही ना दूं और उसे पिरोने लगी कच्चे धागों में लम्हा लम्हा पता ही ना चला कब घर भर गया और नये लम्हे बाहर दरवाजे पे खड़े रहे आज देखा तो सोचा कुछ पुराने लम्हों को आज़ाद कर दूं नये...

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मनोज कुमार झा की पांच कविताएं

एक सिर्फ़ ध्वनि की स्मृतियों में एकाकी है तेरी तलाश अनन्त अबूझ प्रेम। दो जब खाना नहीं मिलेगा नून तेल भात रोटी तो छोड़ो माटी को कोड़ोगे तो मूस भी नहीं मिलेगा केकड़ा बेंग भर-भर जाँघ पानी में डोड़वाँ साँप भी नहीं मिलेगा खेत में जब कुछ जन्मेगा ही नहीं...

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मुसाफ़िर बैठा की दो कविताएँ

फिर भी आधुनिक   आप अपने घरों में छत्तीस कोटि मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना आपस में छत्तीसी रिश्ता बरतने वाले देव अराधना में आकंठ डूबे-तैरें स्वार्थ कर्म में पड़कर स्वकर्म-धर्म छोड़ उनके जूते चाटें तलवे सहलाएं आप फिर भी आधुनिक   कथित रामराज्य की शंबूक प्रताड़ना औ कृष्ण काल के एकलव्य...

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तीन युवा कवि, तीन कविताएं

मैंने सहेजा है तुम्हें गौरव भारती मैंने सहेजा है तुम्हें ज्यों पत्तियां सहेजती हैं धूप माटी सहेजती है बारिश फूल सहेजता है खुशबू चाँद सहेजता है चांदनी ज्यों माँ सहेजती है बच्चों के लिबास संग लिपटी यादें मैंने सहेजा है तुम्हें जैसे बचपन की बदमाशियां नानी की कहानियां माँ के...

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आदमी के युगपत से मुठभेड़ करातीं शंभु पी. सिंह की कहानियां

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम यह स्पष्ट है कि आदमी का वर्तमानकाल जितना जटिल है, उतना ही संदिग्ध भी है। आदमी का आज इन्हीं अटकलों में बीत जा रहा है कि कल का दिन नितान्त अभाव से भरा था लेकिन आज का दिन ज़रूर ख़ुशियों भरा गुज़रेगा। इसे आदमी की ऐतिहासिक परंपरा...

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सुरेंद्र कुमार की पांच ग़ज़लें

एक जैसे हो तुम, हुए वैसे ही हम इनायत, नवाज़िश, इलाही करम खाने ना देना हमें तुम कभी लबों की क़सम, गेसुओं की क़सम इंकार कर दे, ज़रा दम तो लूं तेरी हां से जानां गई नब्ज़ जम ये गज़लें ये, नज़्में, नज़रबन्द हैं चारों दीवारों में घर की सनम...

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अभिज्ञात की पांच कविताएं

खुशी ठहरती है कितनी देर मैं दरअसल खुश होना चाहता हूं मैं तमाम रात और दिन सुबह और शाम इसी कोशिश में लगा रहा ता-उम्र कि मैं हो जाऊं खुश जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता नहीं जानता कि ठीक किस ..किस बिन्दु पर पहुंचना होता है आदमी का...

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नूर मोहम्मद ‘नूर’ की दस ग़ज़लें

एक बे-देश हो रहल बा जे हिंदोस्तान में हरछन समा रहल बा हमर देह-परान में कुछ ए तरा से लोग बा नेतन के मन में, ओह जइसन के गंदगी हो भरल नाबदान में चहुंओर चित होके पड़ल बा तमाम देश पर झंडा उड़ि रहल बा गजब आसमान में भासा सभे...

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सुशील कुमार की पांच कविताएं

एक जितने दृश्य दर्पण ने रचे थे वे सब उनके टूटने से बिखर गए रेत पर लिखी कविताएँ लहरें अपने साथ नदी बीच ले गई अब जो रचूँगा, सहेजकर रखूँगा हृदय के कागज पर अकथ लिखूंगा l ● दो एक रीते समय में न सुख न दुःख न चाह न...

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केवल मां की बंदगी नहीं है वंदेमातरम्

वेंकटेश सिंह फूल-सा खिल जाता है मन… जब कोई मां की वंदना करता है। रोमांच से भर जाता है रोम-रोम… जब कहीं से वंदे मातरम् की धुन गूंजती है वंदे मातरम् सिर्फ गीत नहीं है। यह सिर्फ बंदगी भी नहीं है। यह कृतज्ञ राष्ट्र की आराधना है। यह उस शस्य...

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राकेश कुमार श्रीवास्तव की पांच कविताएं

मैं सार्वजनिक हो गया बहुत दिन हुए एक कविता नहीं लिखी बहुत दिन हुए एक कहानी नहीं पढ़ी जब-जब प्रयास किया कविता ने मुझे लिख दिया और कहानी ने मुझे पढ़ लिया अफसोस मैं सार्वजनिक हो गया सबके लिखने पढ़ने में कसौटी जमीन खा जाती है जमीर को और जमीर?...

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डॉ मंजुला श्रीवास्तव के दो गीत

नारी की पीड़ा पुरुष भला कैसे कह सकते लुटी   अस्मिता   की   पीड़ा पुरुष भला कैसे सह सकते सही   निर्भया  ने जो  पीड़ा नारी तो है शक्ति स्वरूपा श्रम से कभी न घबराती असह्य वेदना सहे प्रसव की शिकन न चेहरे पे आती ममता प्यार का  शक्तिस्रोत अविरल निर्झर  है बहता...

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पंकज शर्मा की तीन कविताएं

1. मुकम्मल वक्त बता देती हैं. मुझे मंदिर की घंटियाँ ये जरूरी नहीं कि जगाने के लिए भगवान ही आएं दिख जाता है सत्य मजलूम की आँखों में भी ये जरूरी नहीं कि इसके लिए श्मशान ही जायें मेरे घर के कबाड़ में पड़े हैं कई टूटे फूटे खिलौने…. माँ...