Monthly Archive: September 2016

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शुक्ला चौधरी की पांच कविताएं

युद्ध और जीवन बहुत पेचीदा मामला है ये युद्ध हुआ युद्ध तो भी मैं सोचूंगी अपने बारे में ही कि किस तरह तुम तक पहुंचू और तुमसे कहूं कि लो मुझे छू कर बैठो शायद- पृथ्वी बच जाए. दुनिया इस फूल पर से गुज़रकर कोई युद्ध नहीं होगा/यहीं फूल को...

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शहंशाह आलम की पांच कविताएं

पेंटिंग : शहंशाह आलम   खोलना खोलने की जहाँ तक बात है लगता है रहस्य का रहस्य आश्चर्य का आश्चर्य तक खोल डाला है किसी परिचित जैसा   लेकिन मेरे जैसे झूठे ने उस घर का द्वार खोला तो लगा कितना कुछ खोलना बाक़ी रह गया है अभी भी  ...

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क़ैस जौनपुरी की कहानी ‘सफ़ेद दाग़’

इला बड़ी देर से बस के आने का इन्तज़ार कर रही थी. काफ़ी लम्बे इन्तज़ार के बाद जब बस आई, तो इला भीड़ के साथ बस में चढ़ तो गई, लेकिन बैठने के लिए उसे सीट नहीं मिली. उसने भीड़ से खचा-खच भरी हुई बस से उतर जाना चाहा, ये...

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‘पिंक’ से दो कदम आगे है ‘पार्च्ड’

संदीप श्याम शर्मा “पार्च्ड” का मतलब बंजर, शुष्क, जला हुआ, भुना हुआ, सूखा आदि है लेकिन लीना यादव द्वारा लिखित-निर्देशित यह फ़िल्म इतनी हरी-भरी और ख़ूूबसूरत है कि अंत तक आते-आते सबकी बांछे खिल उठेंगी, हर तरफ़ हरियाली दिखाई देगी। सभी किरदार अपनी-अपनी कहानी लेकर चलते हैं, आगे बढ़ते हैं...

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महावीर राजी की कहानी ‘पंच’

रेलवे स्टेशन के गर्भ से नाल की तरह निकल कर ऐश्वर्या राय की कमर की तरह छुई मुई सी “स्टेशन सरणी ” शहर के बीचों बीच से गुजरने वाले अजगरनुमा ‘शेर शाह सूरी मार्ग ‘ को जिस स्थान पर लम्बवत क्रॉस करती आगे बढ़ जाती है, वह जगह शहर के...

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प्रसिद्ध नाइजीरियाई कथाकार चिनुआ अचेबे की कहानी ” डेड मेन्स पाथ “

अंग्रेज़ी से  हिन्दी में अनुवाद मृतकों का मार्ग मूल लेखक: चिनुआ अचेबे अनुवाद: सुशांत सुप्रिय अपेक्षा से कहीं पहले माइकेल ओबी की इच्छा पूरी हो गई । जनवरी , 1949 में उसकी नियुक्ति नड्यूम केंद्रीय विद्यालय के प्रधानाचार्य के पद पर कर दी गई । यह विद्यालय हमेशा से पिछड़ा...

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हिन्दी साहित्य का बाजारकाल

भरत प्रसाद                                                        नयी सदी, नया जमीन, नयी आकाश, नया लक्ष्य, नयी उम्मीदें, नयी आकांक्षाएँ। यकीनन मौजूदा सदी ने मनुष्य और उसके जीवन के प्रत्येक पहलू को नयेपन की आँधी में उलट-पलट कर रख दिया है। परम्परागत मूल्य, मान्यताएँ, रिवाज, संस्कार और तौर-तरीके विलुप्त प्रजातियों की नियति प्राप्त करने वाले...

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प्रमोद बेड़िया की कविता ‘आदतों के साथ’

आदतों के साथ पुराने घर में कई आदतें पड़ी हैं जिन्हें जगह की जगह पड़े रहने नहीं दिया वहाँ के लोगों ने जब मैं नहा कर बाहर लगे आईने के फ़्रेम पर रखी कंघी टटोल रहा था तो ख़ाली जगह हाथ आई उसे लेकर मैं क्या करता मेरी आदतों से...

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मनोज शर्मा की चार कविताएं

वो बात शाम बीती युग बीत चला कहीं पीछे कुछ छूट चला क्या बात  थी रह रह के सताती रही मैं टूटता रहा हर पल यूहीं क्षीण किया मेरी पहचान को मैं टूटा तारा सा एक नभ गगन की टोह में क्रंदन करता रहा हम तुम हम साथ रहे जीवन...

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“नो मीन्स नो”, “नहीं मतलब नहीं”, लड़कों को ना सुनने की आदत डालनी होगी

संदीप श्याम शर्मा “नो मीन्स नो”, “नहीं मतलब नहीं”, लड़की की ना को ना ही मानना। ये बात समझना, लड़कों के लिए ज़रा मुश्किल है, लेकिन ये ही सत्य है, उन किवंदतियों से लड़कों को निकल जाना चाहिए जिनमें कहा जाता है कि “इश्क़ में, इन्कार में भी हाँ छिपा...

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सुप्रिया सिन्हा की दो कविताएं

 माँ     मुझे    आने    तो  दे माँ   मैं  एक   कली   हूँ फूल  बनकर अपनी ‘खुशबू’ बिखेरने   तो   दे,,,,,, माँ,, मैं  एक  नन्हीं सी पंछी हूँ खुली  सृष्टि में अपने स्वप्नों का पंख  फैलाने  तो  दे । माँ  मुझे आने तो दे । मैं ही बहन,, मैं ही बेटी हर रूप में ...

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रवि सुतार की तीन कविताएं

पासपोर्ट स्विट्ज़रलैंड हो जैसे गाँव का बस स्टैंड खेत से गाँव की दूरी जितनी है उतनी ही दूर तेरे लिए सिडनी है डिनर दुबई में ब्रेकफास्ट के लिए इटली है स्लिम सा ड्रिंक हैबिट तेरी यार तेरा काश्तकार अमली है अंग्रेजन पट गई तू कैसे..?? घास नहीं डालती मुझे गाँव...

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भरत प्रसाद की कहानी ‘देख तमाशा पानी का’

यह पानी भी न, कमाल का मायावी है भाई। पूछो तो कहाँ नहीं घुसा हुआ है ? जीव में, जानवर में, मिट्टी और पत्थर पेड़-पालों, बंजर-धरती, आकाश यहाँ तक कि हवा का भी पीछा नहीं छोड़ता। होगी हवा उड़नछू, पानी उसका भी बाप है। वैसे पानी है बेरंगा, मगर इसके...

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सुषमा सिन्हा की चार लघुकथाएं

1. बेटा स्थानांतरण के फलस्वरूप कार्यालय में आये नये साहब ने अनुकम्पा पर नियुक्ति पाये एक क्लर्क से पूछा- ‘क्या बात है? तुम बार-बार छुट्टी क्यों लेते रहते हो?’ कलर्क ने उत्तर दिया- ‘क्या करें साहेब, माँ बहुते बीमार रहती है। उसका देखभाल करना पड़ता है न। उसको दस हजार...

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सुशील कुमार की 10 कविताएं

एक एक बूँद से जन्मा हूँ बूँद है जल में थल में तल में अतल में नदी में समुद्र में आकाश में मेघ में जंगल में जंगम में पर्वत को रेत घाटी को पर्वत बनाती है एक बूँद एक बूँद में बसा है समूचा ब्रह्मांड ! दो कैसे देखूं –...

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यशपाल शर्मा की तीन लघुकथाएं

सच्चा प्यार “यार मैं कोमल के बिना ज़िंदा नहीं रह सकता।” रमण ने बड़ी ही मासूमियत के साथ कहा। “क्यूँ? ” मैंने अनायास ही पूछ लिया। ” तुम नहीं जानते मैं कोमल से कितना प्यार करता हूँ।  सच्चा प्यार।  बहुत ज़्यादा चाहता हूँ मैं उसे। अपनी जान से भी ज़्यादा।...

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परितोष कुमार पीयूष की कविता ‘बाज़ारवाद’

बाज़ारवाद सत्ता की पीठ पर बैठा बाज़ारवाद देखो किस प्रकार राक्षसी हँसी हँस रहा प्रवेश कर तुम्हारे ही घर और समाज में तुमसे छीन ली है तुम्हारी सारी संवेदनाएं और तोड़ दिए हैं समस्त मानवीय रिश्तों को तार-तार कर तुम्हारी सभ्यता की शालीनता बेच दी है तुम्हें और तुम्हारी विरादरी...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पांच कविताएं

सिस्टम रास्ता रोका है मज़दूरों ने क्योंकि उन्हें रोटी की जरूरत है पुलिस ने बरसाए हैं डंडे क्योंकि भूख उन्हें भी  लगती है भूख दीवानी है मैंने ठंडे चूल्हे में मुहब्बत को दम तोड़ते देखा है भूख दीवानी है किसी को नहीं छोड़ती दूसरा पहलू पहली बार  उसे डर लगा...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘दो दूना पांच’

     कैसा समय है यह / जब भेड़ियों ने हथिया ली हैं / सारी मशालें /                               और हम निहत्थे खड़े हैं … जैसे पहाड़ से एक बहुत बड़ा पत्थर तेज़ी से लुढ़कता हुआ सीधा...

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कविता के नए प्रदेश की नए महत्व की कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा शहंशाह आलम हिंदी कविता की नई ज़मीन जिस तेज़ी से बड़ी हो रही है, विकसित हो रही है, यह देखकर कविता के इतिहासकारों को प्रसन्नता ज़रूर होनी चाहिए, कविता के उन इतिहासकारों को, जो कविता-इतिहास-लेखन के समय ईमानदार बने रहते हैं। मेरे विचार से कविता की ऐतिहासिकता इसी बात...