Monthly Archive: September 2016

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मार्टिन जॉन की दो कविताएं

छवियां गढ़े जाने की दास्तां                        छवियां शाश्वत है जैसे ज़िन्दगी , जैसे मौत , जैसे फ़लक पर चांद सितारे जैसे सूरज का भभकना , दमकना , चमकना छवियां गढ़ने की आदिम कथा सृष्टि ने लिखी है युगों युगों से कथा बांची जा रही है निरंतर जैसे हरिकथा अनंता अकाट्य सत्य...

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डॉ. श्रुति फौगाट की कविता ‘यादों के मौसम’

कभी वक़्त कतरा कतरा बह रहा होता है तो याद आ जाते हैं कुछ पुराने पल, मानो सालों से बंद डायरी के पन्ने पलट गए हों, और उस बंद पुरानी डायरी की खुशबू कुछ कुछ नयी सी लगती है हर बार… खामोश सी हो जाती हूँ मैं, हर पलटते पन्ने...

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हंस राज की लघु कथा ‘दान’

आज मैं बहुत जल्दी में था।  दफ्तर के लिए घर से निकलते-निकलते देर हो गई थी।  सोचा पैदल मेट्रो स्टेशन तक जाऊंगा तो और देर हो जाएगी। अतः रिक्शा ले लिया।  रिक्शेवाला लोहे के छर्रे पर अपनी बूढी हड्डियों के सहारे रिक्शा को खींचता स्टेशन की तरफ चल पड़ा।  स्टेशन...

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प्रमोद बेड़िया की कहानी ‘किनारे-किनारे दरिया, किश्ती बांधो जी**’

मैंने उससे कहा – ये तुम्हारा नाम आर्या नहीं भी तो हो सकता था । साथ चलते- चलते वह रुक गई । रूकी हुई वह ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही । मैंने सोचा उससे यह बात पूछूँ कि हर लड़की ही क्या रुकने पर ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती है ” फिर सोचा...

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भरत प्रसाद की पांच कविताएं

प्रतिरोध अमर है  जब  फुफकारती हुई मायावी सत्ता का आतंक जहर के मानिंद हमारी शिराओं में बहने लगे जब झूठ की ताकत  सच के नामोनिशान मिटाकर हमारी आत्मा पर घटाटोप की तरह छा जाय जब हमारी जुबान फ़िजाओं में उड़ती दहशत की सनसनी से गूंगी हो जाय जब हमारा मस्तक...

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राज्यवर्द्धन की नौ कविताएं

कागज की कश्ती कागज की नाव बचपन की अब भी तैर रही है पानी में फर्क सिर्फ इतना है कि उसमें मैं नहीं मेरे बच्चे सवार हैं इसलिए मैं किसी से कागज की कश्ती लौटाने की जिद नहीं करता प्रतीक्षा किसी सुबह आप उठते हैं और बारिश की गंध महसूस...