Monthly Archive: October 2016

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कुमार विजय गुप्त की कविता ‘दीपावली की रात तुम’

एक लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद धूपबत्ती की भीनी खुशबू और घंटी की सुरीली आवाज़ के बीच अराधना की मुद्रा में हाथ जोड़े खड़ी तुम दिखती हो एक सुंदर मंदिर -सी और मेरे भीतर जड़ जमाने लगती है आस्तिकता की दूब दो नन्हें नन्हें टिमटिमाते दीपों को करीने से सजाकर छज्जे,...

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लकी निमेष की दो ग़ज़लें

एक पसीना वो बहाकर देख बच्चों को खिलाता है जला के खून सारा दूध वो उनको पिलाता है अदाकारी गरीबों में गरीबी ला ही देती है जिसे ग़म हजारो हैं वही हँसकर दिखाता है अमीरों सीख लो हुनर तुम भी गरीबों का कि आँसू आँख में होते हुए कैसे छिपाता...

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वत्सला पांडेय की पांच कविताएं

एक गमले में रोपना चाहती हूँ तुम्हारी यादों के बीज सीचूंगी इन्हें बड़े जतन से वक्त के साथ फूटेंगे इसमें अंकुर दो पत्तियों से बढ़कर बनेगा पौधा तना ,टहनियां ,पत्तियां कुछ फूल भी खिलेंगे उन खुशबुओं से लबरेज जब तुमने अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाया था घण्टों मुझे मनाया था...

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प्रवीण कुमार की दो कविताएं

पेंसिल, कलम, गुलाब वाले बच्चे ‘क’ से कलम नहीं जानता वह ‘प’ से पेंसिल मायने भी नहीं समझता शायद गुलाब जैसा खुद रहा होगा कभी शायद जन्म लेने के वक्त या कुछ महीनों बाद तक पर अब हो गया है सूखकर कांटे जैसा स्कूल का मुंह नहीं देखा लेकिन कर...

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राजकिशोर राजन की चार कविताएं

शहीद मीनार के नीचे हुआ हूँ शहरी आया था गाँव से बतियाया हूँ, बहुत कवि, लेखक, चित्रकार से रहा हूँ, सभ्य लोगों के समाज में घूमा हूँ वेश्याओं के साथ भी अब जा कर खड़ा हूँ शहीद मीनार पर और आँय-बाँय-साँय चिल्ला रहा हूँ लगातार कि गलत समय में, गलत...

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मार्टिन जॉन की पांच कविताएं

 बची रहे चिड़िया    चख रही है चिड़िया खिला रही है बच्चों को पेड़ के पके –अधपके फल तृप्ति का मधुर गीत गाते हुए अपनी हरी –भरी बाहों से संभाले फलों की टोकरी गुनगुना रहा है पेड़  क़ुर्बानी वाली कविता मौन रहकर सबकुछ लुटा देने का ज़ज्बा दिखाते हुए |  ...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘अपना शहर’

( उन सभी को समर्पित जिन्हें  ‘ अपना शहर ‘ छोड़ना पड़ा ) ” लीजिए , आपका शहर आ गया , ” पत्नी ने कार का शीशा नीचे करते हुए कहा । कार शहर के बाहरी इलाक़ों से गुज़र रही थी । ” पापा , आप यहीं बड़े हुए थे...

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कैलाश मंडलोई की दो कविताएं

तुम गाते हो…….. तुम गाते हो गाते ही जाते अपना वही राग पुराना। भूख मिटाने, तन ढकने, सिर छिपाने का। कितने दिन बीते कितने युग बीते कितने राजा आए गए कितनी सत्ताऐं बनी मिटी कितनी सरकारें आई गई कितने वादे किए गये कितनी योजनाएं बनी, तुम्हारा राग बदलने की पर...

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मनीष वैद्य की कहानी ‘एक्वेरियम में मछलियां’

कल दोपहर की ही बात थी। तान्या दरवाजे को ठेलती हुई हवा के झोंके के मानिंद घर में घुसी थी। बस्ता सोफे पर फेंकते हुए पैरों से ही जूते दाएं और बाएं कोनों की ओर उछाल दिए। वह दौड़ते हुए अपनी मम्मी के गले में दोनों हाथ डाले झूलने लगी।...

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आरती कुमारी की पांच कविताएं

वह लड़की आती है रोज गन्दे बोरे को अपने कांधे पर उठाए ‘वह’ लड़की’ और चुनती है अपनी किस्मत-सा खाली बोतल, डिब्बे और शीशियां अपने ख्वाबों से बिखरे कुछ कागज के टुकडा़ें को और ठूंस देती है उसे जिंदगी के बोरे में गरीबी की पैबन्दों का लिबास ओढ़े कई पाबन्दियों...

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मुक्तिबोध : सातवीं इन्द्री का औघड़ साधक

भरत प्रसाद कुल आयु कुछ अधिक नहीं- महज 47 साल। मतलब नौजवानी से कुछ ही कदम आगे। पथ-प्रदर्शक आलोचना की विलक्षण मौलिकता लिए जीना, कविता की तीखी धार चमका-चमका कर महाबली कुसमय से लड़ने का हौसला बांधना और बित्ता भर की कलम के आगे अपने सुख, आनन्द, सुकून, शान्ति, स्वास्थ्य...

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प्रतिभा सिंह की पांच कविताएं

1 किसी ने कहा आदमी खूबसूरत है मैंने कहा पेड़ खूबसूरत है… फिर आदमी की कुछ खूबसूरती क्रोध ने, कुछ ईर्ष्या ने, कुछ लोभ ने, कुछ द्वेष ने छीन ली …. फिर छीन ली दिल ख्वाहिशों  ने फिर एक दिन आदमी ने पेड़ के वज़ूद को मिटा डाला खूबसूरती के...

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शैलेंद्र शांत की पांच कविताएं

गांधी जी के बंदर जो देख सकते हैं देखना नहीं चाहते जो बोल सकते हैं बोलना नहीं चाहते जो सुन सकते हैं सुनना नहीं चाहते बहुत समझदार हो गए हैं गांधी जी के बंदर!   जिंदगी! तू कहीं सजा तो नहीं… खुद ही पूछ बैठती हो जब भी पाती हो...

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अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक मैं  ढूँढता हूँ आज  मेरा  घर कहाँ गया रिश्तों  के बीच प्यार का मंज़र कहाँ गया अपनी ही धुन में लोग हैं खोए हुए तमाम तनहा  हरेक  शख्स है लश्कर कहाँ गया वो भी तो अपने आप में सिमटा रहा बहुत मैं भी हदों को  तोड़ के बाहर  कहाँ ...