Monthly Archive: November 2016

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘क्या नाम था उसका?’

अब पानी सिर से ऊपर गुज़र चुका था । लिहाज़ा प्रोफ़ेसर सरोज कुमार के नेतृत्व में कॉलेज के शिक्षक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए । धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया । प्रोफ़ेसर सरोज कुमार देश के एक ग़रीब और पिछड़े प्रांत के क़स्बे किशन नगर के सरकारी कॉलेज में पिछले पच्चीस...

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सुरेखा कादियान ‘सृजना’ की तीन ग़ज़लें

एक जिन्दगी को पहेली बनाया न करो दर्द हो दिल में गर मुस्कुराया न करो परदा न हो कोई अपनों से कभी राज गैरों को मगर बताया न करो डर अंधेरों से है जो इतना तुमको सितारों से घर अपना सजाया न करो न हो कि डाल दें तुम्हें ही...

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राजेश ‘ललित’ शर्मा की तीन कविताएं

मौन 1. मौन मौन, अब तो बोलो। कुछ हल्के रह गये शब्द, थोड़ा वज़न डालो इनमें, ज़रा अब तोलो। नहीं ,वही कुछ भाव भरो; अब बोलो, मौन मौन—–! 2. मौन क्यूँ है? क्यूँ  तू अब भी चुप है! कोहरा है,धुंध है, अंधकार घना घुप है। बैठा है ,सहता है सदियों...

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गियासुर्रहमान की कहानी ‘बीच की दीवार’

उर्दू कहानी मूल लेखक :  गियासुर्रहमान अनुवाद : नसीम अजीजी पूरे दस दिन हो गए थे। फ़साद की आग जो भड़की तो बुझने का नाम नहीं लेती थी। सारे शहर में सख्त कर्प्यू के बावजूद वारदातें हो रही थीं। पूरी दस रातें आंखों में गुजर गईं। इस क़दर शोर-शराबे में...

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नीलम नवीन ‘नील’ की तीन कविताएं

खुशियां सर्द सुबह गुनगुनी सी धूप मीठी गर्म चाय नंगे पावों के नीचे नर्म दूब बेसिरपैर की गप्पें अधखुली कुछ खुली पोटलियां खुशियों की थोड़ी शिकायतें मेरे पास है तुम्हें देने को किन्तु आज व्यस्त तुम बेहद अस्तव्यस्त हो खामोशी की खोज गुनगुनी सर्दियां आते जाते बादल ताप व सिहरन...

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बच्चों को पुस्तकें उपहार में दी जानी चाहिए : दिविक रमेश

20वीं शताब्दी के आठवें दशक में अपने पहले ही कविता–संग्रह ‘रास्ते के बीच’ से चर्चित हो जाने वाले सुप्रतिष्ठित कवि दिविक रमेश को 38 वर्ष की आयु में ही ‘रास्ते के बीच ’ और  ‘खुली आँखों में आकाश’ जैसी साहित्यिक कृतियों पर सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड मिला। दिविक रमेश ने...

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आरती आलोक वर्मा की तीन रचनाएं

चुप चुप  ऐ दर्दे गम चुप चुप ऐ दर्दे गम, कोई देख ना ले छुप छुप ऐ बहते नयन कोई देख ना ले घुट घुट के सीने में है जो दफन, ऊफ् ऊफ् ऐ मौत सरीखा जलन, चुप चुप ऐ जलते जख्म कोई देख ना ले।। मुस्कान की सूरत में...

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आत्मसंघर्ष के महत्वपूर्ण कवि तेजिंदर गगन

सुशील कुमार “यह कविता नहीं एक बयान है कि अब चिड़िया को कविता में आने की इजाजत नहीं दी जाएगी। चिड़ियां, पेड़, बच्चा और मां – इनमें से कोई भी नहीं आएगा कविता में यहां तक कि कविता भी नहीं । समय के ऐसे दौर में जब बादशाह खाता है...

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मुहम्मद अब्यज ख़ान की दो कविताएं

सात जन्म जब कभी तुमको महसूस हो अकेलापन जब कभी उचट जाये ज़िन्दगी से मन थाम लेना फिर मेरा हाथ तुम ये वादा रहा मेरा तुमसे सनम सात जन्मों तक न सही उम्रभर साथ निभाएंगे हम एहसास आँखों में समंदर है और चेहरा उदास है बिखरी हुई ज़िन्दगी टूटी हुई...

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गौतम कुमार सागर की कविता ‘मन’

ना जाने किस किस कूल फिरे यह नादान नाव -सा मन लहरें, जाल , रेत , नमक मछुआरे के गाँव -सा मन सर्द इच्छाएँ.. जमा इर्द गिर्द मधिम मधिम अलाव सा मन कभी सिमटा कभी खुला रंग मोर पंख की छाँव सा मन पुरखे ,पीपल , नदी , नहर दूर...

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सेवा सदन प्रसाद की लघुकथा ‘रिवाज’

विमलेश शोध के सिलसिले में जलपाईगुड़ी पहुंचा ।वह जनजाति पर शोध कर रहा था ।जलपाईगुड़ी के टोटापड़ा कस्बे में जनजातियों की काफी संख्या है ।विमलेश को वही जगह उचित लगा ।वहां पर आवास की व्यवस्था करने में जुटा था तभी बाबलू से मुलाकात हुई जो जनजाति का ही था ।बाबलू...

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मुसाफ़िर बैठा की चार कविताएं

पिता की निर्ब्याज याद बचपन में गुजर गए पिता की याद का कोई ठोस मूलधन भी नहीं है मेरे पास जिस पर यादों का कोई ब्याज जोड़-अरज पाऊं मैं   पिता के बारे में अलबत्ता मां के बयानों को कूट-छांटकर मेरे मन ने जो इक छवि गढ़ी है पिता की...

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शिवदयाल की तीन कविताएं

प्रतीक्षा प्रियजन-स्वजन सारे छूट गए, मेरी सूनी-रातों के तारे हाय बुझ गए ! इस एकाकी अन्धियारे पथ पर एक टिमटिमाते प्रकाश –स्तम्भ के नीचे तब भी प्रतीक्षा करती- सी मैं क्या जानूँ कि तुम ? हाँ तुम ही खड़ी हो ! प्रतिबद्धता कुछ नहीं कहीं कुछ नहीं इस उबड़- खाबड़ अंतहीन...

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सीमा संगसार की छह कविताएं

खंडहर स्त्रियाँ जी लेती हैं अपने अतीत रूपी खंडहरों में जो कभी कभी सावन में हरिया जाते हैं — वीरानगी तो उसकी पहचान है जहाँ आवाज दो तो वह पुनः लौट आती है सभी खंडहरों में दफन होते हैं कई राज जिसे स्त्रियों ने दबा कर रखा होता है किसी...

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अर्नेस्ट हेमिंग्वे की कहानी ‘इन अनदर कंट्री’

अमेरिकी कहानी दूसरे  देश में मूल लेखक : अर्नेस्ट हेमिंग्वे अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद : सुशांत सुप्रिय शरत् ऋतु में भी वहाँ युद्ध चल रहा था , पर हम वहाँ फिर नहीं गए । शरत् ऋतु में मिलान बेहद ठण्डा था और अँधेरा बहुत जल्दी घिर आया था । फिर...

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निर्मल गुप्त की दो कविताएं

मेरे बचपन का कलकत्ता  कलकत्ता कोलकाता हो गया बचपन स्मृति  लिए बाबा गुलाम रसूल की खुरदरी अंगुली थामे हुगली किनारे आज भी वहाँ हुमकता है. बाबा की सुनाई कहानी के आलसी बौने और उदास मसखरे आज भी फोर्ट विलियम्स में अलगोजे पर उदास धुन बजाते द्वितीय विश्व युद्ध की यादें...

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सुधा चौरसिया की तीन कविताएं

बलात्कारियों के नाम! इस साल तुम मेरी चीखों के नाम एक प्रेम पत्र लिखो लिखो कि हवा तुम्हारे बिना जहरीली है फूल तुम्हारे बिना सौंदर्यहीन है इस साल तुम मेरी चीखों के नाम एक प्रेम पत्र लिखो लिखो कि धरती की हरियाली तुम्हारे बिना नीरस है आकाश की नीलिमा तुम्हारे...

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कैलाश मंडलोई की कहानी ‘निमाई का गजरू दादा’

बहुत समय पहले की बात है। गंगा नदी के किनारे चरनोई नाम का एक छोटा सा गाँव था। इसी गाँव में निमाई रहता था। तीन वर्ष का निमाई बहुत ही सुन्दर और चंचल स्वभाव का बालक था। उसके बचपन की लीलाओं को देखकर लोगों को कृष्ण की बाल-लीलाएं याद आ...

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कृष्ण सुकुमार की सात कविताएं

(1) उन दिनों जब हम बच्चे ही थे, तुम कहीं नहीं थे ! न तुम्हारी कोई कल्पना थी, न धारणा, न उपस्थिति न आकार ही कोई ! किंतु एक उत्कट बेचैन अभिलाषा तुम्हें छू लेने की… तुम्हारा साथ पाने की… क्या था वह सब ! हम साथ साथ खेलते साथ...