Monthly Archive: December 2016

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रामकेश सिंह की पांच कविताएं

एक निःसंदेह अन्न और अक्षर की लड़ाई नहीं जीत सकते हम मजहबी किताबों से, अखबार या चैनलों के शोर में फ़ैल रही गदगद आत्ममुग्धता से छिप नहीं सकती बारूदी गंध गुप्त मंत्रणाएं इधर भी हैं, उधर भी हैं इसलिए नहीं कि लड़ाई जमीनों की है इसलिए कि लड़ाई कमीनों की...

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संजीव ठाकुर की तीन बाल कविताएं

 दाना दे दो          दाना दे दो चिड़िया को ओ! मेरी नानी और वहीं डालो बर्तन में थोड़ा-सा पानी। आएगी तो खाएगी चिड़ियों की रानी खुश होकर उड़ जाएगी पीकर वह पानी। फिर भेजेगी औरों को वह लेने दाना, पानी खुश हो जाओगी, देखोगी उनको पीते पानी! दीपों का त्योहार दीपों...

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वीणा भाटिया की चार कविताएं

प्रकृति से… 1. नदी की धारा में हाथ डालना छूना महसूस करना कितनी बातें करती है नदी हमसे   जाने कब से है धरती पर कहाँ-कहाँ से गुज़र कर कितने तट कितने रास्ते पार करती बहती जा रही है   सबसे सरल सृजन है बचपन के बनाए चित्रों में जो...

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आदमियत की दुखती रग के निर्दोष राग ढूंढ़ने का नया तरीक़ा

पुस्तक समीक्षा किताब :  चाक पर रेत ( जाबिर हुसेन ) शहंशाह आलम मेरा मानना है कि हर लेखक किसी पहाड़ी कबीले का सदस्य होता है। तभी तो हर लेखक जीवन को, जीवन से जुड़े संघर्ष को इतने निकट से देख पाता है। यह सही भी है। एक सच्चे लेखक...

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सपना मांगलिक के दस हाइकू

1 जितना जिया लिखा बस उतना लिखूं क्या आगे ? 2 मन अन्दर दुःख का समंदर उठे क्यूँ ज्वाला ? । 3 चीखे खामोशी द्वंद नाद दिल में सुने न कोई । 4 मति भ्रमित ह्रदय कुरुक्षेत्र खुलें न नेत्र । 5 फूटी रुलाई भरी सूखी जग की ताल तलाई...

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गरीब-शोषितों के लेखक थे गुरदयाल सिंह

वीणा भाटिया गुरदयाल सिंह भारतीय साहित्य की यथार्थवादी परंपरा के ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने पूरी दुनिया में पंजाबी उपन्यास और कथा साहित्य को एक विशिष्ट पहचान दिलाई। विश्व साहित्य में इन्हें प्रेमचंद, गोर्की और लू शुन के समकक्ष माना जाता है। प्रेमचंद के बाद शायद ही किसी भारतीय साहित्यकार को दुनिया...

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टॉयलेट में घर : दिनेश शर्मा की तीन कविताएं

टॉयलेट में घर (1) जब हम घर की दर्प की दीवारों को कर रहे थे ऊँचा देख रहे थे फर्श के शीशे में अपनी उपलब्धियों का चेहरा खुशियों के आँगन में लगा रहे थे स्वामित्व की बाड़ कपड़ों गाड़ियों मशीनों को सहेजते आत्म मुग्धा में बौराई जब हमारी दुनिया सुलभ...

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विमलेश त्रिपाठी की पांच कविताएं

 सपना गाँव से चिट्ठी आयी है और सपने में गिरवी पड़े खेतों की फिरौती लौटा रहा हूं पथराये कन्धे पर हल लादे पिता खेतों की तरफ जा रहे हैं और मेरे सपने में बैलों के गले की घंटियाँ घुँघरू की तान की तरह लयबद्ध बज रही हैसमूची धरती सर से...

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मार्टिन जॉन की तीन लघुकथाएं

लाइक “अरे बेटा , तैयार हो जा | कॉलेज जाने का समय हो गया है |…..कितनी देर से लैपटॉप में घुसे हो !” दादाजी अपने पोते से मुख़ातिब थे | “वेट ए लिटिल दादाजी !……..लाइक्स गिन रहा हूँ |” “काहे का लाइक्स भई ?” “कल हमने मम्मी की डेथ वाली...

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रेखा श्रीवास्तव की कविता ‘एक स्त्री की दिनचर्या’

एक स्त्री की  दिनचर्या पिछले कई दिनों लड़ाई चल रही है एक स्त्री और एक पत्नी के बीच स्त्री ने कसम खाई है कि वह अपनी आत्मरक्षा, सम्मान के लिए अब नहीं झुकेगी पत्नी का दिल पिघलता है, वैसे ही जैसे पिघलता  आ रहा है कई सालों से अपने दर्द...

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मज़दूरों के संघर्ष का देखा-भोगा सच

पुस्तक समीक्षा सुशील कुमार आजादी के इतने सालों बाद भी जब दुनिया के प्रगतिशील देशों में रोटियों के हादसे हो रहे हों तो परिवेश का दबाव कवि को जनाकीर्ण विभीषिका पर कविता लिखने को मजबूर करता है। गोया कि , युवा कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का पहला काव्य संकलन “रोटियों...

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पंकज चौधरी की चार कविताएं

दिल्ली दिल्ली में समाज नहीं है दिल्ली में व्यक्ति ही व्यक्ति है दिल्ली में राम का नाम नहीं है दिल्ली में सुबह और शाम काम ही काम है दिल्ली में श्रम का दाम नहीं है दिल्ली में श्रम ही श्रम है दिल्ली में प्यार नहीं है दिल्ली में तिज़ारत ही...

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गर्म राख में सुबकती ग़ज़लों में आक्रोश का तेवर

अदम गोंडवी की ग़ज़ल- पुस्तक “समय से मुठभेड़” की समीक्षा दीप नारायण ठाकुर जब कोई पाठक किसी रचना को पढ़ता है और यह महसूस करता है कि यह तो उसके आसपास की है , उसकी ज़िंदगी से , लोगों की ज़िंदगियों से जुड़ी हुई है तो समझना चाहिए कि रचनाकार...

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मनी यादव की एक ग़ज़ल

मेरा मुकद्दर ग़म की कालिखों में उलझ गया चराग-ए-मोहब्बत जलने से पहले बुझ गया मुस्कराने ही वाला था आंसुओं की सम्त देखकर उससे पहले ही खुशियों का कारवां गुज़र गया वाकया-ए-ज़िन्दगी में ग़ुरबत एक अभिशाप है जो उलझा था सवाल आज वो सुलझ गया ज़माने से तेरी अदावत पहले ही...

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सुशांत सुप्रिय की तीन कविताएं

1. स्त्रियाँ हरी-भरी फ़सलों-सी प्रसन्न है उनकी देह मैदानों में बहते जल-सा अनुभवी है उनका जीवन पुरखों के गीतों-सी खनकती है उनकी हँसी रहस्यमयी नीहारिकाओं-सी आकर्षक हैं उनकी आँखें प्रकृति में ईश्वर-सा मौजूद है उनका मेहनती वजूद दुनिया से थोड़ा और जुड़ जाते हैं हम उनके ही कारण 2. वह...

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कमलेश भारतीय की चार लघुकथाएं

सहानुभूति वे विकलांगों की सेवा में जुटे थे । इस कारण नगर में उनका नाम था ।मुझे उन्होंने आमंत्रण दिया कि आकर उनका काम देखूं । काम देखकर कुछ शब्द चित्र खींच सकूं । वे मुझे अपनी चमचमाती गाड़ी में ले जा रहे थे । उस दिन विकलांगों के लिए...

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क़ैस जौनपुरी की कहानी ‘ए… चश्मे वाले…!’

ट्रेन रुकी. बहुत सारे लोग छोटे से डिब्बे में चढ़े. कुछ उतरे भी. एक साथ चढ़ने-उतरने में कुछ लोग आपस में टकराए भी. कुछ अपना गुस्सा पी गए. कुछ ने कुछ नहीं कहा. वहीं एक से रहा नहीं गया. वो उतरने ही वाला था कि एक चढ़ने वाले से टकरा...

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हंसराज की चार ग़ज़लें

एक जब से सुना कि माँ बीमार पड़ गई हम भाइयों के बीच दरार पड़ गई सबसे बड़ा नुकसान  बंटवारे का ये हुआ, मां आधी इस पार, आधी उस पार पड़ गई उम्रों की जमापूंजी थी रिश्तों की ये दौलत, आज वो ही सरेआम  तार-तार पड़ गई मशरूफ हैं हम...

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लड़की : सुशील कुमार की पांच कविताएं

एक लड़की के रूप की रजनीगंघा खिली है अभी-अभी उमंग जगी है उसमें अभी-अभी जीवन का रंग चटका है वहाँ अभी–अभी   जरूर उसका मकरंद पुरखों के संस्कार माँ की ममता, पिता के साहस भाई के पसीने और दादी-नानी के दुलार से बना होगा   देखो, कितना टटका दिख रहा वह फूल...

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लोकप्रिय साहित्य एक आवश्यक सीढ़ी

वीणा भाटिया एक समय हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन ने काफी जोर पकड़ा था। अमूमन हर बड़े शहर ही नहीं, छोटे कस्बों से भी लघु पत्रिकाएं निकलती थीं। भले ही इनका प्रसार कम होता था, पर स्थानीय स्तर पर ही सही, साहित्य के प्रचार-प्रसार में इनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं...