Monthly Archive: January 2017

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विजयानन्द विजय की दो लघुकथाएं

पेंटिंग ट्रेन का एसी कोच — जिसमें आम तौर पर सम्पन्न लोग ही यात्रा करते हैं।आमजनों के लिए तो यह शीशे-परदे और बंद दरवाजों के अंदर की वो रहस्यमयी दुनिया है, जिसके बारे में वे जानते तक नहीं हैं। एक परिवार आमने-सामने की छ: सीटों पर अपने पूरे कुनबे के...

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अर्जित पाण्डेय की कविता ‘यादों के दरीचों से’

एक हसीन ख़्वाब कागज़ की तरह मोड़कर दिल के कमरे में बने यादों के दरीचे पर मैंने रख दिए है धूमिल न हो जाए वो पन्ना इसलिए अक्सर उसे अपने आंसुओ से धोता हूँ उस  ख़्वाब को सजाने में वक्त की कितनी सीमाएं लांघी हमने, ये सोचता हूँ उस पन्ने...

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डॉ भावना कुमारी की पांच ग़ज़लें

1 कैसा अपना है ये सफ़र मालिक कुछ न आता है अब नज़र मालिक लूट लाते हैं, कूट खाते हैं कर रहे हैं गुजर -बसर मालिक चोट जब भी लगी है सीने पर टूटने लगती है कमर मालिक आ ही जाता है सबके चेहरे पर बीतती उम्र का असर मालिक...

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रोहित कौशिक की पांच कविताएं

चुप है  किसान खेत में हल जोतता  किसान और तैयार बगुलूे चुनने को कीड़े-मकोड़े कीड़े-मकोड़े/जो मिटा सकते हैं बगुलों की भूख और हानिकारक हैं फसल के लिए इसलिए चुप है  किसान इसी व्यवस्था के बीच बगुलों का भोजन बन रही है केंचुओं की जमात भी। और अब किसान मजबूर है...

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वहाँ पानी नहीं है : दर्द को जुबान देती कविताएँ

पुस्तक समीक्षा वीणा भाटिया ‘वहाँ पानी नहीं है’ दिविक रमेश का नवीनतम कविता-संग्रह है। इसके पूर्व इनके नौ कविता-संग्रह आ चुके हैं। ‘गेहूँ घर आया है’ इनकी चुनी हुई कविताओं का प्रतिनिधि संग्रह है। गत वर्ष ‘माँ गाँव में है’ संग्रह आया और बहुचर्चित हुआ। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने...

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शुक्ला चौधुरी की चार कविताएं

जन्म पूस का महीना तभी तो कहूं इस महीने से इतनी खुशबू क्यों आती है मेरी मां की– पूस वह एक भारी और भरा हुआ महीना था लबालब जैसे हवा ठन्ड,फूल और पानी कुछ भी खाली नहीं आधा चाँद– आकाश– शान्त युद्धरत थी बस मेरी मां मैं शोक नहीं मनाती...

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कमलेश भारतीय की दो लघुकथाएं

शुरुआत ‘मैं मर क्यों नहीं जाती ?’ जमाने भर की सताई हुई औरत ने खुद से ही बुदबुदाते कहा । ‘तुम जिंदा ही कब थी ?’ औरत के अंदर की औरत ने सवाल किया । ‘तुम ठीक कहती हो । जिसके जन्म पर घर में मातम छा जाए, उसे जिंदा...

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राजेश ‘ललित’ शर्मा की चार कविताएं

एक किसने कहा वक़्त कम है, वह दिग्-दिगन्त है, अनंत है; बस मेरे पास, ही शेष कम है। मैं ज़रा खर्चीला हूँ। दो हिसाब—-? क्या——-? मुझे सब है पता, हाशिये पर , होगा सिर्फ़ /मेरा नाम। देनदारियाँ होंगी सारी की सारी, सिर्फ़ मेरे /नाम ; भरे होंगे हाशिये । चुकाऊँगा...

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अरविंद श्रीवास्तव की सात कविताएं

अरविन्द श्रीवास्तव की कविताएँ अपने समय के खतरों का ताजा बयान है।  आधुनिक होते मनुष्य का समय प्रेम के अनुकूल होने की लंबी प्रतीक्षा में बीतता जा रहा है, जो बड़ी त्रासद और वेदनायुक्त है। इसे मनुष्यता पर खतरे की संकेत के रूप में कवि देखता है – “लिहाजा यह...