Monthly Archive: February 2017

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वेद प्रकाश की तीन प्रेम कविताएं

एक लंबी प्रेम कविता तुम धूप में अपने काले लंबे बाल जब-जब सुखाती हो सूरज का सीना फूल जाता है और पूरे आकाश पर छा जाता है मैंने देखा है गुलमुहर के नीचे बस का इंतजार करते हुए बस आए या न आए तुम्हारी छाया गुलमुहर को चटख कर देती...

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डॉ हरविंदर सिंह बक्शी की तीन कविताएं

विनाश निकट खड़ा है यह धरा पर क्या घटित हो रहा है जाग रहा बाज़ार, इंसान सो रहा है। दागदार करता प्रकृति का आंचल बीज विनाश के मानव बो रहा है। सुरसा जैसी बढ़ रही  सड़कों पर गाड़ियां लील रही लोलुपता वृक्ष, वन और झाड़ियां। तप रहे पर्वत, पिघलती हिम-शिलाएं...

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आकांक्षा यादव की तीन कविताएँ 

21वीं सदी की बेटी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी बेटी को माँ ने सिखाये उसके कर्तव्य ठीक वेैसे ही जैसे सिखाया था उनकी माँ ने पर उन्हें क्या पता ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है जो कर्तव्यों की गठरी ढोते-ढोते अपने आँसुओं को चुपचाप पीना नहीं जानती है...

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डॉ किरण मिश्रा की पांच कविताएं

एक उदास मौसम और गुलाम इच्छाओं की सारी कविताएं भेज दी गईंं प्रश्नों के साथ जबकि जरुरत थी कापते हांथोंं लड़खड़ाते पैरोंं को उनकी कोहालाल में वो कहानियां भी नहीं ठहरीं जिनमे बचा था सच कहना घाटियों ,दर्रों ,पहाड़ियों में घूमती गज़लों ने धूएं की महक सूंघने से किया इंकार...

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समकालीन कविता का महत्वपूर्ण दस्तावेज : दिल्ली की सेल्फी कविता विशेषांक

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव लड़ना था हमें भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ हम हो रहे थे एकजुट आम आदमी के पक्ष में पर उनलोगों को नहीं था मंजूर यह। उन्होंने फेंके कुछ ऐंठे हुए शब्द हमारे आसपास और लड़ने लगे हम आपस में ही! वे मुस्कुरा रहे हैं दूर खड़े...

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अमरजीत कौंके की पांच कविताएं

साहित्य अकादमी, दिल्ली ने पंजाबी के कवि , संपादक और अनुवादक डा. अमरजीत कौंके सहित 23 भाषाओँ के लेखकों को वर्ष 2016 के लिए अनुवाद पुरस्कार देने की घोषणा की है. अमरजीत कौंके को यह पुरस्कार पवन करन की पुस्तक ” स्त्री मेरे भीतर ” के पंजाबी अनुवाद ” औरत मेरे...

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सुधा चौरसिया की तीन कविताएं

संस्कार के कीड़े! जिया तुमने हजारों साल जिस मिथकीय इतिहास में रेंगता है खून में वह तुम्हारे आज भी निकल नहीं पायी अभी तक तुम अपने आदर्श ‘सीता’ के जाल से बोल लेती हो बहुत लिख भी लेती हो बहुत पर झेलती हो अभी तक उस भीषण आग को मत...

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वीणा भाटिया की कविता ‘ख़ाली पन्ना’

किताब को पलटते हुए यकायक ख़ाली पन्ना बीच में आ गया प्रिंटिंग की भूल थी भूल जैसी लगी नहीं चौंका गया सुखद अहसास भी दे गया ख़ाली पन्ना चुटकी बजा कर जगा गया ख़ाली पन्ना चुनौती की तरह हाज़िर हो सवाल करता क्या सोच रहे थे ? आगे क्या सोचा...

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मनी यादव की दो ग़ज़लें

एक अहले-दिल में कुछ छुपे आज़ार निकले हर शहर में इश्क़ के बीमार निकले कुछ सही पर रोशनी देता तो है जब जुगनुओं का काफिला हर बार निकले यूँ तो क़ातिल मर गया खंजर से उसके गिनने में उतने ही फिर हर बार निकले दास्ताँ सबकी कही तुमने मनी पर...

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डॉ छवि निगम की पांच कविताएं

स्वतंत्रता एक भेड़ के पीछे पीछे खड्ढे में गिरती जाती अंधाधुंध पूरी कतार को भाईचारे को मिमियाती पूरी इस कौम इतनी सारी ‘मैं’ हम न हो पायीं जिनकी अब तक, उनको… चंहु ओर होते परिवर्तन से बेखबर चाबुक खाते आधी आँखों पे पड़े  परदे से सच आंकते झिर्री भर साम्यवाद...

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शहंशाह आलम की छह कविताएं

हमला हम गहरे, बेहद गहरे अँधकार भरे युग को जी रहे हैं जिसमें हम प्रेम करते हैं तो हम पर हमले किए जाते हैं एक सफल हत्या एक सफल बलात्कार के लिए सम्मानित अब उनके शब्दों के वर्ण विन्यास, अर्थ, प्रयोग, व्युपत्ति, पर्याय यही थे कि उन्हें भेड़ों के साथ...

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सय्यदैन ज़ैदी की कविता ‘वो जो है ख़्वाब सा…’

वो जो है ख्वाब सा ख़याल सा धड़कन सा सिरहन सा सोंधी खुशबू सा नर्म हवाओं सा सर्द झोकों सा मद्धम सी रौशनी सा लहराती सी बर्क़ सा बिस्तर की सिलवटों सा बाहों में लिपटे तकिए सा जिस्म की बेतरतीब चादर सा सुबहों की ख़ुमारी सा शाम की बेक़रारी सा...

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विजय ‘आरोहण’ की नौ कविताएं

सारंडा, जंगल और आदिवासी,जल, जंगम और प्रतिरोध की कवितायें 1. हमारे पहाड़ों के बच्चे हमारे पहाड़ों के बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते है वह छुप्पम-छुपाई खेलते शाल के पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं वह तीर-धनुषों से निशाना साध रहे हैं इसके लिए वह एक बिजुका बनाते हैं और दनदनाती आती है...

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एस. आनन्द के दस मुक्तक

एक इतना आदर दिया गया मुझको टूटा छप्पर दिया गया मुझको। इस सियासत की गंदी भाषा का अक्षर-अक्षर दिया गया मुझको दो सबको सबका विश्वास नहीं होता है सुख सूरज सा ढल जाता ,अहसास नहीं होता है दुख की बदली जब घिरती है चारों ओर उस वक्त अपना भी अपने...

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तन्वी सिंह की कहानी ‘छोटी सी मुलाक़ात’

आज अगर लास्ट मेट्रो मिल जाए बस। कल से कैसे भी जल्दी निकालूँगा। चाहे साला बॉस कुछ भी कहे। लोग वैलेंटाइन वीक मनाने में बिज़ी है। हम साला गर्ल्फ़्रेंड की जगह बॉस को पटा रहे है। ज़िन्दगी ही ख़राब है। दीपक मन ही बड़बड़ता और भागता हुआ मेट्रो स्टेशन के...

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विभूति कुमार मिश्र की दो कविताएं

एक मैं पुरुष हूं मुझे स्त्रियों का मनोविज्ञान नहीं पता मुझे पता है प्रेम और वासना का अंतर देह मिलन में प्रेम की पराकाष्ठा झलकी है विलीन हो जाने की आग धधकी है देह ने अपना काम किया है ह्रदय साम्राज्ञी को भी क्षणिक दूर किया है पुनः प्रेम ही...

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स्मिता सिन्हा की सात कविताएं

मेरा प्रेम और आगे बढ़ने की इजाज़त नहीं देता चलो अब लौटते हैं हम अपने अपने सन्दर्भों में तथाकथित दायरे से बाहर ना तुम “तुम “रह सकते हो ना मैं “मैं ” कि तंग संकरी गलियों सा प्यार हमारा घोंटता है हमारा वजूद ढीला करो ये आलिंगन कि निकल सकूं...

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शिवदयाल की दस कविताएं

मौन ‘‘माँगना चाहूँ भी तो क्या माँग लूँगा और तुम इतनी सरल कि दे सकोगी ? मान लूँ इस मौन में कुछ भी नहीं है या कि मानूँ प्रेम का परिताप है यह ?’’ सच और सपना जिसकी परछाई से मैं खिल उठता था पूरा हो जाता था उसकी उज्ज्वलता...

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वत्सला पांडेय की दो कविताएं

मन की यात्रा प्यार जिस्म से जिस्म तक की यात्रा भर नहीं है ये मेरे मन से शुरू तुम्हारे मन को स्पर्श करने की कहानी है असंख्य बार तुम्हे महसूस कर लेते है हम तुम्हारी लिखी बातो से कहे शब्दों से तुम्हारी बोलती तस्वीरों से मन मीलों तुम्हारे साथ चलता...

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परितोष कुमार पीयूष की दो कविताएं

एक मेरे सपनों की महफिल में हर शाम तुम आती हो० बड़े ध्यान से मेरी कविताएं सुनती हो आँखें चुराकर मुस्कुराती हो उँगलियाँ बार-बार बालों पर यूँही फेरती हो० मेरे सपनों की महफिल में हर शाम तुम आती हो० एक नयी कविता साथ लाती हो पलकें झुकाकर मुखर आवाज में...