Monthly Archive: February 2017

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मनोज झा की पांच कविताएं

चाँदनी को बहकते देखा चाँदनी को बहकते देखा ये किस आसमान में कि ढल रही है रात किस बियाबान में तुझसे नहीं मुलाक़ात इस जहान में कि मरता रहा मैं किस घमासान में क्या-क्या बदलते देखा चाँदनी को बहकते देखा   कोयलिया नहीं गाती बस पल-दो पल का है  इंतज़ार...

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विमलेश त्रिपाठी की छह कविताएं

एक  एक बच्चे की हंसी हाथ में उसके पसंद का खिलौना   पिता के चेहरे का गर्व बेटे के जीत जाने की एवज में   कवि की पूरी हो गई कविता माथे का सकून   खूब तनहाई में बज उठी फोन की घंटी   भीषण सूखे में उमड़ आए काले-काले...

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विशाल मौर्य विशु की दो कविताएं

सिर्फ़ तुम्हारा नाम भर लिख पाता हूँ बहुत ख़ुश रहता हूँ मैं इन दिनों ये सोचकर कि तुम दिल के करीब आ गयी हो हाँ बहुत क़रीब इतने क़रीब कि ये पता लगाना बहुत मुश्किल हो गया हैं कि मुझमें कहा मैं हूँ ,और कहा तुम हो अब कभी डायरी...

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सीमा संगसार की पांच कविताएं

उफनता प्रेम  जब भी देखती हूँ अपने उफनते हुए प्रेम को चढ़ी आंच पर दूध के भगोने में मार देती हूँ पानी के कुछ छींटे ! अपने मोटे चश्मे से तुम देख नहीं पाते उन महीन सी आहटों को जिसके बिना अधूरे हैं जीवन के कुछ पन्ने— जब तुम जिन्दगी...

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नरेंद्र सैनी की कहानी ‘मासूम माशूक’

  “ऋषि तुमसे कितनी बार कहा है, ऐसा मजाक नहीं करते. तुम मुझ से कितने छोटे हो और फिर भी ऐसी बातें, गंदी बात है.” “तुम मुझे गलत समझती हो पूनम दीदी…” “क्या बकवास है? तुम समझते क्यों नहीं हो? एक तरफ मुझे दीदी कहते हो और दूसरी तरफ ऐसी...

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नंदना पंकज की पांच कविताएं

प्रेम का महीना आकाश का निरभ्र नीलापन मिट्टी की हरी-हरी सुगंध माघ की गुलाबी धूप फागुन की बौराई पुरवैया ख़ुद में घोले हुए ये रुमानी फरवरी जब उतरती हैं तुम्हारी आँखो में तुम्हारी आँखे भांग मिला दूधिया गिलास हो जाती है… बहकने लगती हैं अनुभुतियाँ मन झुमता है जैसे बसंती...

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शहंशाह आलम की चार कविताएं

तुम्हारे नाम लिखता हूँ  तुम्हारे नाम लिखता हूँ आकाश जो मेरा ठिकाना है सदियों से जीवन से फ़सल से पानी से भरा   लेकिन तुम हो कि अपना तलघर छोड़ना नहीं चाहते जो है आदमियों की उदासी से आदमियों के झूठ से डरा।     बाँसुरी मैं जानता हूँ चिलचिलाती धूप के...

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शैलेंद्र शांत की चार कविताएं

तुम्हारी याद जब कभी चलती है चर्चा प्रेम की तुम्हारी याद आती है और दुखी हो जाता हूं अभी भी तनी हैं दीवारें ऊंची-ऊंची भाषा-संप्रदाय की जाति व धर्म की शर्मनाक शर्म की अभी भी हार रहा है प्रेम अखबार के पन्नों पर दंडित हो रहा है प्रेम अभी भी...

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नित्यानंद गायेन की छह कविताएं

प्रेम कविता ‘प्रेम‘ शब्द खुद में सम्पूर्ण प्रेम कविता है प्रेम कविताएँ लिखी नहीं जाती लिख जाती है | प्रेम के अहसासों को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता हूँ व्यक्त हो भी जाये कभी तो उसे महसूस करें ऐसा पाठक कहाँ ? प्रेम अहसास है गहरे अनुभवों का गूंगे...

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सुषमा सिन्हा की पांच कविताएं

1. उसने कहा ‘तुम इतना हँसती क्यों रहती हो’ उसने फिर कहा ‘तुम्हें हँसने के सिवा भी कुछ आता है’ थोड़ा सकुचाई वह पल भर रुकी फिर नजर भर नजर को देखा ‘नहीं आता’ कह कर फिर से हँस पड़ी क्षण भर वह ठिठका और जोर से हँस पड़ा।। 2....

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘सावन में लग गई आग, दिल मेरा…’

नरिंदर कुमार रोमांटिक और भावुक क़िस्म का आदमी था । उसे एक लड़की से इश्क़ हो गया । भरी जवानी में इश्क़ होना स्वाभाविक था । अस्वाभाविक यह था कि उस समय पंजाब में आतंकवाद का ज़माना था । नरिंदर कुमार हिंदू था । जिस लड़की से उसे इश्क़ हुआ...

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नवनीत पांडेय की तीन कविताएं

प्रेम करनेवाले लड़के- लड़कियों प्रेम करनेवाले लड़के- लड़कियों! सावधान! अब तुम्हें प्रेम करने से पहले हजार बार सोचना समझना होगा अभी तक तुम्हारा संघर्ष घर, परिवार, जात-समाज से था पर अब इनके साथ सरकारें भी हैं तैयार हो जाओ! देने के लिए प्रेम परीक्षाएं तय हो रहे हैं पाठ्यक्रम प्रेम...

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आनन्द गुप्ता की छह कविताएं

पहली बार पहली बार हमने लुटाए अँजुरी भर-भर कर तारें पहली बार हमने समेटे बाँह भर कर आकाश पहली बार हमने सुनी पृथ्वी के चलने की आवाज नदी के दिल की धड़कन दो देहों के बीच बजने वाला संगीत पहली बार हमने सुनी धरती के किसी अँधेरे कोने से बाहर...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘विरासत’

श्रीकांत जिस दिन अठारह साल का हुआ , उसी दिन उन्मादियों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी । देश में जगह-जगह दंगे शुरू हो गए जिनमें निर्दोष लोग मारे जाने लगे । उस दिन श्रीकांत देर तक रेडियो और टी.वी. पर ख़बरें देखता-सुनता रहा । आज़ाद भारत के इतिहास...

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कमलेश भारतीय की चार कविताएं

एक दिन जब थक जाता है तब रात उसे थाम लेती है दिन और रात की सुख और दुख की जुगलबंदी का नाम ही जिंदगी है, मित्रो । दो वसंत तुम आए हो तुम्हारा स्वागत् है पर मैं तुम्हारे फूलों का क्या करूं? किसी शहर में आगजनी किसी में लगा...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी ‘चटकल’

नरेश झुंझला गया। उसे लगा चटकल में बदली मजदूर का काम करना और भीख मांगना बराबर है। पिछले तीन दिनों से लेबर ऑफिस का चक्कर लगा-लगा कर वह हलकान था लेकिन बाबू थे कि काम देने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बस एक ही ज़वाब–आज लोक नहीं लागेगा।(आज...

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सुधेश की एक ग़ज़ल

खिडकी मेँ इक चाँद उगा है अच्छा लगता है उस से मुहब्बत हो जाएगी ऐसा लगता है । इस दुनिया के मेले मेँ तो खूब तमाशे हैँ फिर भी क्योँ हर शख्स  अकेला लगता है । क्या है जिस को ढूँढ रहा हूँ भूल भुलैया मेँ. जिस को देखा हर...

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जीवन के क्रूर अनुभवों की जीवन्त कथा यात्रा है ‘कल्लन चतुर्वेदी’

पुस्तक समीक्षा शहंशाह आलम एक कहानीकार का आदमी की ज़िंदगी के साथ गहरा रिश्ता होता है। इसलिए कि एक कहानीकार ख़ुद आदमी होता है और जिसमें ज़िंदगी भी होती है। और एक कहानीकार ख़ुद ज़िंदगी से गुत्थमगुत्था करता रहा होता है, संघर्ष करता रहा होता है, नक़ली चमत्कारों की पोल...

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शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ के पांच नवगीत

आँखें देखीं कहाँ अँजोर     कब तक पकड़े आम आदमी आसमान की डोर दस की सौ में नमक बेचते अफवाहों के शोर   अदहन जोड़ी घिसट-घिसटकर चुम्बकीय वह सींक घास-पात ही को उबालकर पीयी प्राय: छींक रात हुई तो देखी आँखें देखीं कहाँ अँजोर   कालाधन के पास पड़ा...