Monthly Archive: March 2017

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শেলী নন্দীর কবিতা ‘মন্দ হলে ‘

অবুঝ মনের অবাধ্যতায় ডাক পড়ে সর্বনাশী খেলার। গোপন থেকে সঙ্গোপনে কুড়িয়ে রাখি ইচ্ছে পালক। মন্দ হওয়ার বেপরোয়া শক্তিতে পরাজিত হয় মনের রক্তকরবী।  মনের সাথে শরীর মেশে, শরীর জুড়েও মন। লজ্জারা যায় নির্বাসনে শীতের ঝরাপাতা হয়ে। শিহরন জাগরন মিলেমিশে রং পায় উষ্ণতার বুকে। অভিমানী সত্ত্বা বেপথু হয় অভিসারী বাঁশীর হাতছানিতে। শিশিরের...

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मनीष कुमार ‘मुसाफिर’ की एक ग़ज़ल

हरेक दर्द से अब तो गुजर जाना है करके खुद से वादा मुकर जाना है । जानते है कि जख्म जीने नही देंगे दर्दे जिगर में थोड़ा उतर जाना है । जीने के बहाने कब तक ढूंढते फिरे मौत आयेगी और हमें मर जाना है । क्या जानेगा बेदर्द जमाना...

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कविता हमें त्रासदी से बाहर निकालती है : मदन कश्यप

 राजभाषा विभाग, बिहार सरकार के   ‘नागार्जुन-सम्मान’ से सम्मानित  कवि मदन कश्यप का कविता-पाठ शहंशाह आलम की रिपोर्ट    ‘गूलर के फूल नहीं खिलते’, ‘लेकिन उदास है पृथ्वी’, नीम रोशनी में’, ‘कुरुज’ और ‘दूर तक चुप्पी’ जैसे महत्वपूर्ण कविता-संग्रहों के कवि मदन कश्यप की कविताओं का पाठ पटना में स्थित ‘टेक्नो हैराल्ड’...

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मनी यादव की एक ग़ज़ल

तेरी यादों का अभी दिल पर असर बाकी है जो करेंगे साथ में तय वो सफ़र बाकी है यूँ तो अश्क़ों से मुकम्मल हो चुका है दरिया फिर भी दरिया में मुहब्बत की लहर बाकी है कुछ तो डर खुद से या मौला से तू आदम तेरा तुझ पर ही...

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अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते   नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते   कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर ...

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স্বাতী মজুমদারের কবিতা ‘আত্মপরিচয়’

একবার বুঝতে চেয়ে বুঝতে চেষ্টা কর আমায়। জলের চেয়েও সহজ আমি। আর না চাইলে? পৃথিবীর সবচেয়ে জটিল ধাঁধাটাও হার মানবে আমার কাছে। না। আমার চেতনার রঙে কখনও পান্না সবুজ, চুনী রাঙা হয়ে ওঠেনি । আমি কখনও পুবে পশ্চিমে আলো জ্বালব বলে চোখ মেলিনি আকাশে। গোলাপের দিকে চেয়ে কখনও বলিনি ‘সুন্দর’।...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘विवशता’

जब सुबह झुनिया वहाँ पहुँची तो बंगला रात की उमस में लिपटा हुआ गर्मी में उबल रहा था । सुबह सात बजे की धूप में तल्ख़ी थी । वह तल्ख़ी उसे मेम साहब की तल्ख़ ज़बान की याद दिला रही थी । बाहरी गेट खोल कर वह जैसे ही अहाते...

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শ্রীরূপ বিশ্বাসের লেখা ‘পাহাড়’

পাহাড়ের সাথে আমার একটা ভালোবাসা জড়িয়ে আছে। সবুজের সাথেও। একটা সিনেমার কথা মনে পরে, ‘দিল সে’, ছবিতে গুরু শাহ্‌রুখ খান এবং মনীষা কৈরালা ছিলেন কিন্তু আমাকে সব থেকে বেশি যা টেনেছিল তা হল পাহাড়।  ওই প্রথম আমার পাহাড় আর ধোঁয়াশা দেখা। পাহাড়ের কোলে হেঁটে বেড়ানো, বসে থাকা বা যাচ্ছেতাইগিরি করার...

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विशाल मौर्य विशु की तीन ग़ज़लें

एक यार अब  तो ऐसा  आलम  हो गया है मेरा हर इक जख्म मरहम हो गया है कुछ दिनों से वो नज़र आया नहीं के तनहा तनहा सा ये मौसम हो गया है हसते हैं सब, खुश मगर कोई नहीं है आदमी का आँसू हमदम हो गया है ये भी...

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ইন্দ্রজিৎ বন্দ্যোপাধ্যায়ের ব্যঙ্গ ‘স্বচ্ছ ভারত’

মাইরি বলছি। এমন তাজ্জব কথা শালা বাপের জন্মে শুনিনি। হলফ করে কইতে পারি, আপনারাও শোনেননি। তবে সে নিয়ে মাথাব্যথার প্রয়োজন নেই। আমার মতো তো আর সবার কপাল পোড়া নয়। ঠাণ্ডা ঘরে বসে, চা সিগারেট পা দোলানি নিয়ে, দশটা খবর আর গল্পের মাঝে এ খেদোক্তিও চোখে পড়বে কারুর কারুর। তবে, দু...

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मार्टिन जॉन की दो कविताएं

मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ   उसने शपथ ली , “मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ ……….” और वह राजा बन गया   इसके पहले मज़हबी क़िताबों की कसमें खा चुका है कई कांडों को सरअंजाम देने के मामले में .   ईश्वर सर्वशक्तिमान है ईश्वर उसे शक्ति देगा...

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মৌমিতা গুঁইর কবিতা ‘নীলস্বপ্ন’

আমার দুঃখের সূর্য ঝলমল করে আকাশে রাতের তারারা মিটিমিটি চায় ভাবসম্প্রসারণের চাঁদ হোক যতই ঝলসানো রুটি, রুটিতে যে বড্ড অরুচি। মেঘ যদি পিওন হয়, দমকা হাওয়া নিয়ে আসে উড়োচিঠি – বসন্ত চাই না আমি, অপেক্ষা করছি কালবৈশাখী। উড়ে যাবে ছাতা, আমি কিন্তু ইষ্টনাম জপতে জপতে ভাবব ডুবল বুঝি তরী –...

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সৌমেন দত্তর কবিতা ‘পরিণীতা’,

প্রহর গুলো অরুণা জালে ঘিরেছে, অভ্যাসের চিলেকোঠার বদ্ধতা থেকে, তোমার টানে কিনারাহীন কিনারায় পদার্পন। রজনীগন্ধা নেই,বকুল গাছও নেই, তবুও ঘরছাড়া এ মন। মিথ্যে মুখে সত্যির স্নো পাউডারে শহরটা চকচকে, কান্না আর হাহাকারের নিত্য আনাগোনা। কষ্টের দহনে,দগ্ধ আর্তনাদ, এতো কোলাহল আর্তনাদের মাঝে শান্তি খুঁজি। রঙিন জৌলুশে ঠাসা, চতুর্দিক উনকোটি চৌষট্টি কর্মে...

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चन्द्रप्रकाश श्रीवास्तव की छह कविताएं

गतिमान हने दो समय को भागता है समय तो भागने दो समय को कुलाचें भरने दो समय चीखता-चिल्लाता है तो चीखने चिल्लाने दो समय अकुलाता है तो अकुलाने दो समय विलाप करता है तो सुनो समय का विलाप अच्छा है समय का गतिमान रहना कुलाचें भरना चीखना-चिल्लाना हांफना और विलाप...

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দিল্লিতে বাংলা বইয়ের মেলা

বর্ণালী চন্দ দিল্লি বেঙ্গল অ্যাসোসিয়েশনের আয়োজিত বইমেলাটি এবারে ষোড়শী হলেন । চারিদিকে শুধু বাংলাবই দেখা আর পছন্দসই বই কেনা,এযেন এক স্বপ্নপূরণের গল্প!দিল্লির বুকে এমণ এক আয়োজনের জন্য অবশ্যই সাধুবাদ প্রাপ্য বেঙ্গল অ্যাসোসিয়েশনের । আমার মতো যারা বাংলার বাইরে বাস করেন অথচ বাংলা বই পড়ার জন্য মুখিয়ে থাকেন তাদের জন্য নিউ...

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कृष्णधर शर्मा की चार कविताएं

नदी और औरत किसी झरने का नदी बन जाना ठीक वैसे ही तो जैसे किसी लड़की का औरत बन जाना जैसे एकवचन से बहुवचन हो जाना जैसे अपने लिए जीना छोड़कर दुनिया के लिए जीना जैसे दूसरों को अमृत पिला खुद जहर पीना अद्भुत सी समानताएं हैं नदी और औरत...

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तरसेम कौर की कहानी ‘खूबसूरत घाव’

कहानी एक बड़ा सा आलीशान पुराना घर था। वहाँ चालीस बरस की एक औरत अपने पति,  एक बेटे और एक बेटी के साथ रहती थी। उसके चेहरे पर हमेशा एक मुस्कान धरी रहती थी । सुन्दर सी साड़ी और उससे मैचिंग करती बिंदी और हल्के से गुलाबी रंग की लिपिस्टक...

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ललित शर्मा की दो कविताएं

 बिजूका जानते नहीं , क्या होता, बिजूका? एक टाँग , पर खड़ा हुआ, बाँहें पसारे, मटकी का सिर लटकाये, सदा मुस्कराये, पराली का शरीर, चीथड़े लगा कोट, खेत जैसे इसका हो। कौआ भगाने को, लगाया इसको, चिड़िया तक नहीं , भागती, चूहे भी, कुतर जाते टाँग , इसी की, कभी...

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मीनू परियानी की लघुकथा ‘मज़बूरी’

आज राधा को कुछ ज्यादा ही देर हो गयी थी मै दो बार बाहर जा कर देख आई थी पर उसका दूर दूर तक पता नही था. राधा मेरी कामवाली बाई थी जो कभी कभी अपनी बेटी को भी काम पर ले आती थी। रानी उसकी बेटी जिसकी उसने छोटी उम्र में...

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कमलेश भारतीय की दो लघुकथाएं

ईश्वर का जन्म वे टूटे घरों का मलबा या कबाड़ उठाने का काम करते थे । कभी काम मिलता , कभी नहीं । रेहड़ी खडी रहती । खच्चर का चारे का खर्च अलग । ऐसे खाली समय में बैठे सोच रहे थे कि क्या किया जाए । ईश्वर तुम कहां...