Monthly Archive: December 2018

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डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की 2 लघुकथाएं

मुखौटे साथ-साथ खड़े दो लोगों ने आसपास किसी को न पाकर सालों बाद अपने मुखौटे उतारे। दोनों एक-दूसरे के ‘दोस्त’ थे। उन्होंने एक दूसरे को गले लगाया और सुख दुःख की बातें की। फिर एक ने पूछा, “तुम्हारे मुखौटे का क्या हाल है?” दूसरे ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया, “उसका...

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प्रतिभा चौहान की 5 कविताएं

मत करो नियमों की बात आज सिसकियाँ और रुदन के बीज क्या पनपते रहेंगे बलिदानों की धरा पर क्या पसीने की बूँदे न पिघला देंगी तुम्हारे पत्थर के सीने को चहकते महकते मचलते उछलते बच्चों की कोहनियों की चोटें कब तक बोती रहेंगी व्यथा की फ़सल क्या आज बोए बीज...

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शिवदयाल के उपन्यास ‘एक और दुनिया होती’ का एक अंश

                       रात को ओढ़ने के लिए मेरे पास तो कुछ था नहीं। रात एक झोपड़ी के ओसारे में गुजारनी थी। पुआल का बिस्तर लगा और मुझे सहारा मिला बम्बइया से। उनके पास कंबल था। बीड़ी सुलगाने के पहले उन्होंने कंबल खोला और मुझ पर डाल दिया। कुछ इधर-उधर की बात...

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पुस्तक विमोचन व सम्मान समारोह

लोकोदय प्रकाशन द्वारा दिनांक 16-12-2018 को वन अवध सेण्टर (One Awadh Center), सिनेपोलिश, विभूति खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ में अपराह्न 1.00 बजे से पुस्तक विमोचन व सम्मान समारोह का आयोजन किया गया है। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ नवगीतकार मधुकर अष्ठाना को स्व. जगदीश गौतम स्मृति सम्मान से सम्मानित किया जाएगा...

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শিখর থেকেসাগর

  সুব্রত চৌধুরী 3 এবার বিদেশএসে প্রথম রাতটা ভালই ঘুম হয়েছিল। তবে ঘুম ভাঙে সকাল দু’টোর সময়।বুঝলাম যে বায়োলজিকাল ঘড়ি ঠিকঠাকই কাজ করছে, দিল্লির সময়েআমাকে চালাচ্ছে। তারপর চেষ্টাচরিত্র করে খানিক ঘুমোতে পারলেও, বিশেষ ঘুম আরহল না। ফলে সকাল ছ’টার মধ্যে আমরা সেজেগুজে ব্যাগ গুছিয়ে তৈরি।কিন্তু বাইরে যা ঠাণ্ডা তাতে একটু...

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अवधेश कुमार ‘अवध’ के 2 गीत

1. दीपों का बलिदान याद हो जब  मन में अज्ञान भरा हो, अंधकार अभिमान भरा हो, मानव  से  मानव  डरता हो, दिवा  स्वप्न  देखा करता हो, गलत राह मन को भाती हो, मानवता   खुद   शर्माती हो,          धर्म कर्म अभियान याद हो ।        ...

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পড়ুণ সুব্রত চৌধুরীর ভ্রমণ কাহিনী ‘শিখর থেকে সাগরে’

শিখর থেকে সাগর ১ সুব্রত চৌধুরী অফিস থেকে আজ তাড়াতাড়িই বেরোলাম। তিনটের সময় বেড়িয়ে মেট্রোতে পালম পৌঁছলাম সাড়ে তিনটেয়। অন্যদিন পালম মেট্রো স্টেশন থেকে তিন কিলোমিটার হেঁটে বাড়ি পৌঁছই। লোকজনকে বলি যে স্বাস্থ্য রক্ষার উদ্দেশ্যে বাধ্যতামুলক হাঁটাহাঁটি হয়ে যাচ্ছে, কিন্তু আসলে বাসভাড়া বাঁচানোর চেষ্টা। আজ রিকশা করে বাড়ি ফিরলাম, গচ্চা...

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संजय शांडिल्य की 5 कविताएं

पिता की तस्वीर आज झाड़ते हुए आलमारी अखबार के नीचे मिल गई पिता की वही तस्वीर कई साल पहले ढूधवाले के हिसाब के वक्त भी यह इसी तरह पाई गई थी माँ की डायरी में फूल की पँखुरी-सी सुरक्षित फिर एक रात जब दादी के दाँतों में हुआ था भीषण...

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मीनू परियानी की लघुकथा ‘माता का जगराता’

सुबह से ही कोठी में रौनक थी। नौकर-चाकर सब दौड़ रहे थे। शाम को माता का जगराता जो होने वाला था। बेटा, बहू सब अति व्यस्त। आज सुबह से माँ कुछ अस्वस्थ थी। बेटा एक बार जाकर माँ का हाल पूछ आया था। बहू तो वैसे  ही अतिव्यस्त थी। ‘माँ को भी...

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सुशांत सुप्रिय की 10 कविताएं

1. एक सजल संवेदना-सी उसे आँखों से कम सूझता है अब घुटने जवाब देने लगे हैं बोलती है तो कभी-कभी काँपने लगती है उसकी ज़बान घर के लोगों के राडार पर उसकी उपस्थिति अब दर्ज़ नहीं होती लेकिन वह है कि बहे जा रही है अब भी एक सजल संवेदना-सी समूचे घर में — अरे बच्चों ने खाना खाया कि नहीं कोई पौधों को पानी दे देना ज़रा बारिश भी तो ठीक से नहीं हुई है इस साल 2. निमंत्रण ओ प्रिय आओ कोई ऐसी जगह तलाश करें जहाँ प्रतिदिन मूक समझौतों के सायनाइड नहीं लेने पड़ें जहाँ ढलती उम्र के साथ निरंतर चश्मे का नंबर न बढ़े जहाँ एक दिन अचानक यह भुतैला विचार नहीं सताए कि हम सब महज़ चाबी भरे खिलौने हैं   चलो प्रिय कौमा और पूर्ण-विराम से परे कहीं जिएँ 3.बोलना हर बार जब मैं अपना मुँह खोलता हूँ तो केवल मैं ही नहीं बोलता माँ का दूध भी बोलता है मुझमें से पिता की शिक्षा भी बोलती है मुझमें से मेरा देश मेरा काल भी बोलता है मुझमें से 4. हक़ीक़त हथेली पर खिंची टूटी जीवन-रेखा से क्या डरते हो...

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दीप्ति शर्मा की 5 कविताएं

1. काले तिल वाली लड़की कल तुम जिससे मिलीं फोन आया था वहाँ से तुम तिल भूल आयी हो सुनो लड़कियों, ये तिल बहुत आवारा होते हैं चन्द्र ग्रहण की तरह काला तिल अनाज नहीं होता ये पूरी दुनिया होता है जिससे मिलो सँभल कर मिलो ये मिलना भी ज्वार...