Monthly Archive: February 2019

0

शहंशाह आलम के कविता संग्रह ‘थिरक रहा देह का पानी’ से 5 कविताएं

तीली आपके पास कितना कुछ बचा है अब भी जीने के लिए कई सदियां मेरे पास एक तीली बची है माचिस की आपके अंधेरे कोने को रौशन करने के लिए यह तीली बचाए रखना चाहूंगा उसके प्रेम के बचे रहने तक 2. मुझ में मैने देखा मेरे अंदर एक नदी...

0

शशांक पांडेय की 7 कविताएं

शशांक पांडेय सुभाष लाँज, छित्तुपुर, बी.एच.यू, वाराणसी(221005) ● मो.नं-09554505947 ● ई.मेल-shashankbhu7@gmail.com 1. खिड़कियाँ मैंने बचपन में ऐसे बहुत से घर बनाएं और फिर गिरा दिए जिनमें खिड़कियाँ नहीं थीं दरवाजें नहीं थे बाकी सभी घरों की तरह उस घर में  मैंने सबकुछ लगाए थे लेकिन फिर भी  दुनिया को साफ-साफ...

0

पल्लवी मुखर्जी की कविता ‘औरत और चिड़िया’

पल्लवी मुखर्जी वह औरत तमाम दुःखों को रखती है संदूक के भीतर तह लगाकर फिर एक-एक कर उन्हें खोलती जाती है परत दर परत उनसे गुज़रती है और डूबती जाती है आँखों के समुद्र में गोते लगाती हुई किनारे पर मिल जाती है एक चिड़िया से औरत और चिड़िया एक...

0

सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘लाश’

सुशान्त सुप्रिय A-5001 ,गौड़ ग्रीन सिटी ,वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,ग़ाज़ियाबाद – 201014( उ. प्र. )मो: 8512070086ई–मेल: sushant1968@gmail.com घर के ड्राइंगरूम में उनकी लाश पड़ी हुई है  । उनकी मृत्यु से मुझे गहरा झटका लगा है ।  मैं सदमे में हूँ । बुझा हुआ हूँ ।  मेरी वाणी को जैसे लकवा मार गया है ।  हाथ–  पैरों में जैसे जान ही नहीं रही ।  आँखों में जैसे किसी ने ढेर सारा अँधेरा झोंक दिया है ।  वे नहीं गए । ऐसा लगता है जैसे मेरा सब कुछ चला गया है । जैसे मेरी धमनियों और शिराओं में से रक्त चला गया है । जैसे मेरे शरीर में से मेरी आत्मा चली गई है । जैसे मेरे आसमान से सूरज, चाँद और सितारे चले गए हैं । सुबहका समय है लेकिन इस सुबह के भीतर रात की कराहें दफ़्न हैं ।  लगता है जैसे मेरे वजूद की किताब के पन्ने फट कर समय की आँधी में खो जाएँगे … मेरे घर में मेरी पत्नी , मेरा बेटा और मेरी बेटी रहते हैं । और हमारे साथ रहते थे वे । वे मेरे यहाँ तब से थे जब से मैंने इस घर में आँखें खोली थीं । बल्कि इस से भी कहीं पहले से वे हम सब के बीच थे । मेरे पिताजी , दादाजी — सब उनकीइज़्ज़त करते थे ।  वे हमारे यहाँ ऐसे रहते थे जैसे भक्त के दिल में भगवान रहते हैं ।  जैसे बादलों में बूँदें रहती हैं ।  जैसे  सूर्य की किरणों में ऊष्मा रहती है । जैसे इंद्रधनुष में रंग रहते हैं । जैसे फूलों में पराग रहता है । जैसे पानी में मछली रहती है। जैसे पत्थरों में आग रहती है । जैसे आँखों में पहचान रहती है … उनकी उँगली पकड़ कर ही मैं जीवन में दाख़िल हुआ था । मेरी सौभाग्यशाली उँगलियों ने उन्हें छुआ था । पिताजी, दादाजी — सब ने हमारे जीवन में उनके महत्व के बारे में हमें बार–बार  समझाया  था ।  उनका  साथ मुझे अच्छा लगता था ।उनकी गोदी में बैठकर मैंने सच्चाई और ईमानदारी का पाठ पढ़ा । उनकी छाया में मैंने जीवन को ठीक से जीना सीखा । सही और ग़लत का ज्ञान उन्होंने ही मुझे करवाया था ।  और मैं इसे कभी नहीं भूला । उनके दिखाए मार्ग पर चल कर ही मैंआज जहाँ हूँ , वहाँ पहुँचा । फिर मेरी शादी हो गई । और यहाँ से मेरे जीवन में मुश्किलों ने प्रवेश किया । मेरी पत्नी पढ़ी–लिखी किंतु बेहद महत्वाकांक्षी थी ।  उसकी  मानसिकता  मुझसे अलग  थी ।  वह  जीवन में सफल होने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी । और ‘ सफलता ‘ की उसकी परिभाषा भी मेरी परिभाषा से बिलकुल मेल नहीं खातीथी । झूठ बोलकर , फ़रेब करके , दूसरों का हक़ मार कर आगे  बढ़ने को भी वह जायज़ मानती थी । उसके लिए अवसरवादिता ‘ दुनियावी ‘ होने का दूसरा नाम था ।  ज़ाहिर है , मेरी पत्नी को उनका साथ पसंद नहीं था क्योंकि वे तो छल–कपट से कोसों दूर थे । फिर मेरे जीवन में मेरे बच्चे आए । एक फूल–सा बेटा और एक इंद्रधनुष–सी  बेटी ।  मेरी    ख़ुशी  की  कोई सीमा नहीं रही । मैंने चाहा कि मेरे बच्चे भी उनसे सही जीवन जीने की शिक्षा ग्रहण करें । जीवन में सही और ग़लत को पहचानें । उनके द्वारासिखाए गए मूल्यों और आदर्शों का दामन थाम लें । किंतु ऐसा हो न सका । बच्चे अपनी माँ पर गए । उन्होंने जो सीखा , अपनी माँ से ही सीखा । इन बीजों में मैं पर्याप्त मात्रा में अच्छे संस्कारों की खाद न मिला पाया । बुराई को नष्ट कर देनेवाले कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं कर पाया । नतीजा यह हुआ कि इन पौधे–रूपी बच्चों में बुराई का कीड़ा लग गया ।  मेरे बच्चे उनकी  अच्छाइयों से कुछ न सीख सके । जब मैं घर में नहीं होता , वे घर के एक कोने में उपेक्षित–से  पड़े  रहते ।  मेरे बीवी –बच्चे उनसे...

0

सतीश खनगवाल की 3 कविताएं

सतीश खनगवाल जन्मतिथि – 18 अक्टूबर 1979 (दस्तावेजी)जन्मस्थान – रायपुर अहीरान, झुनझुनूं (राजस्थान)सम्प्रति – प्राध्यापक, शिक्षा निदेशालय, दिल्ली।कृतियाँ – सुलगता हुआ शहर (कविता – संग्रह), विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, लघुकथाएँ, व्यंग लेख, समीक्षाएँ, आदि प्रकाशित।      वह भी मुरझा जाता है     मुझे देखते ही     उसका पीला पड़ा चेहरा    ...

0

आज के समय में ब्रेख्त

पटना के महाराजा कांप्लेक्स में स्थित टेक्नो हेराल्ड में साहित्यिक संस्था ‘जनशब्द’ द्वारा जर्मन के प्रसिद्ध कवि बरतोल्ट ब्रेख़्त पर केंद्रित समारोह का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित था। पहला सत्र ‘आज के समय में ब्रेख़्त’, जबकि दूसरा सत्र ब्रेख़्त को समर्पित कवि-सम्मेलन का था। कार्यक्रम...

0

चन्द्र की कविता ‘दु:ख’

बहुत दुख से जब ग्रस्त हो जाता हूं मैं तब भीतर भीतर पसीज पसीज के रो रो जाता हूं तब अपनी पलकों पर पसरी हुई कई कई दिनों की मैल को  धो धो जाता हूं और  अंततः किसी घनेरी रात की लम्बी नींद में चुपचाप  सो सो जाता हूं और...

0

सीमा संगसार की कविता ‘आतंकित प्रेम’

सीमा संगसार प्रेम किस चिङ़िया का नाम है उसे तो उङ़ना था किसी उन्मुक्त गगन में उसे रहना था  किसी स्त्री की बेलौस हँसी में …. बारूदी सुरंगों से  गुजरता हुआ  हमारा मुल्क गोलियों की मार खाए  कराह रहा है प्रेम दिवस पर …. नफरतों के इस दौर म़े प्रेम...

0

मुसाफिर बैठा के कविता संग्रह ‘विभीषण का दु:ख’ से 5 कविताएं

मुसाफिर बैठा तीन स्थितियां आदमी मरने के बाद कुछ नहीं बोलता स्वाभाविक स्थिति! दलित मरने के पहले  कुछ नहीं बोलता अस्वाभाविक स्थिति ! ! दलित को आदमी नहीं भी कहा जा सकता स्वाभाविक  स्थिति ! ! ! (उदयप्रकाश की एक कविता से प्रेरित)   डर में घर जिसे तुम कहते...

0

ओम नागर की 7 प्रेम कविताएं

ओम नागर 20 नवम्बर, 1980 को गाँव -अन्ताना, तहसील -अटरु, जिला- बारां  ( राजस्थान ) में  जन्मे ओम नागर ने कोटा विश्वविद्यालय,कोटा से  हिन्दी  एवं राजस्थानी में स्नातकोत्तर और  पी-एचडी की उपाधि प्राप्त की। हिन्दी एवं राजस्थानी साहित्य में कवि,अनुवादक और डायरी लेखक के रूप में  विशिष्ट पहचान रखने वाले युवा कवि- लेखक...

0

संजय शांडिल्य की प्रेम कविताएं

संजय शांडिल्य परिचय जन्म : 15 अगस्त, 1970 | स्थान : जढ़ुआ बाजार, हाजीपुर | शिक्षा : स्नातकोत्तर (प्राणिशास्त्र) | वृत्ति : अध्यापन | रंगकर्म से गहरा जुड़ाव | बचपन और किशोरावस्था में कई नाटकों में अभिनय | प्रकाशन : कविताएँ हिंदी की प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं ‘अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले‘ (सारांश प्रकाशन, दिल्ली) तथा ‘जनपद...

0

कैलाश मनहर की 5 कविताएं

कैलाश मनहर एकयदि कोई भटकता आदमी दिखाई दे तुम्हें उसे मेरे नाम से पुकारनावह जरूर तुम्हारी तरफ़ देेखेगा जैसे मैं दोअच्छा चलता हूँ कह कर आया था उसे और अभी तक नहीं हुआठहरना या लौटनापहुँचना तो शायद कल्पनातीत है तीनमस्तक पर घाव की असह्य पीड़ा को झेलतेअमरत्व का भोगश्राप है या वरदानकवि ही जाने कविता बखाने चारझेल रहा हूँ शीतलहर इसदुर्बल...

0

कोलकाता में 2 दिवसीय साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन

भारतीय भाषा परिषद ने 16-17 फरवरी को साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन का आयोजन किया है, जिसमें देश भर से पहुंचने वाले संपादक-लेखक साहित्यिक पत्रिकाओं की दशा-दिशा, वर्तमान और भविष्य पर अपनी राय रखेंगे। भारतीय भाषा परिषद के प्रेक्षागृह में होने वाले इस दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन प्रसिद्ध हिन्दी कथाकार गिरिराज...

0

प्रद्युम्न कुमार सिंह की 5 कविताएं

प्रद्युम्न कुमार सिंह जन्म : 19 जनवरी सन् 1976 को फतेहपुर जिले की खागा तहसील के घोषी गाँव में शिक्षा : एम० ए० हिन्दी, बीएड हिन्दी संस्कृतप्रकाशन : आलोचना पुस्तक – युगसहचर – सुधीर सक्सेना का सम्पादन ,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। एम० एम० चन्द्रा के साथ साझा संकलन, समकालीन चालीस कवियों के साथ ‘परिधि पर...

0

पवन कुमार मौर्य की 5 कविताएं

पवन कुमार मौर्य जन्मतिथि- 01 जून, 1993शिक्षा– स्नातक भूगोल (ऑनर्स) (बीएचयू, बनारस) एमए (जनसंचार) एमसीयू, भोपाल. प्रकाशन-जनसत्ता, दैनिक जागरण, अमर उजाला, सुबह सवेरे सहित कई प्रमुख समाचार पत्रों में समसामयिक मसले पर सैकड़ों आलेख, टिप्पणी और पत्र प्रकाशित। डिजिटल साहित्यिक मंच- प्रतिलीपी, हिंदी डाकिया, कंटेंट मोहल्ला सहित कई मंचों पर कविता,...

0

कृष्ण सुकुमार की 5 कविताएं

कृष्ण सुकुमार ए०  एच०  ई०  सी० आई. आई. टी. रूड़की रूड़की-247667 (उत्तराखण्ड) मोबाइल नं० 9917888819 kktyagi.1954@gmail.com एक प्रेमिकाएं उड़ रही थीं आकाश में ! प्रेमी धरती पर चुग रहे थे बिखरा हुआ अपना वर्तमान ! खिलती हुई हवाओं के फूलों ने सपनों में बिखेर रखी थी ख़ुशबू ! जब कि...