अभिज्ञात की पांच कविताएं

खुशी ठहरती है कितनी देर

मैं दरअसल खुश होना चाहता हूं
मैं तमाम रात और दिन
सुबह और शाम
इसी कोशिश में लगा रहा ता-उम्र
कि मैं हो जाऊं खुश
जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता
नहीं जानता कि ठीक किस
..किस बिन्दु पर पहुंचना होता है आदमी का खुश होना
कितना फ़र्क होता है दुःख और खुशी में
कि खुशी आदमी को किस अक्षांश और शर्तों
\और कितनी जुगत के बाद मिलती है

वह ठहरती है कितनी देर
क्या उतनी जितनी ठहरती है ओस की बूंद हरी
घासों पर
या उतनी जितनी फूटे हुए अंडों के बीच चूज़े

हालांकि वह समय निकल चुका है विचार करने का
कि क्या नहीं रहा जा सकता खुशी के बग़ैर
तो फिर आखिर में इतने दिन कैसे रहा बग़ैर खुशी के
शायद खुशी की तलाश में जी जाता है आदमी
पूरी-पूरी उम्र
और यह सोचकर भी खुश नहीं होता
जबकि उसे होना चाहिए
कि वह तमाम उम्र
खुशी के बारे में सोचता
और जीता रहा
\उसकी कभी न ख़त्म होने वाली तलाश में।

तोड़ने की शक्ति

जाने क्यों अच्छी लगती हैं टूटने की आवाज़ें
जबकि बार-बार मुझे इनकार है ऐसी आवाज़ों को सुनने से
क्या हममें बसी है कोई पुरातन धुन
जिसकी लय देती है हमारी धमनियों को नयी गति
और दिमाग़ को एक अज़ब सा सुकून
क्योंकि आख़िरकार वही और वही है हमारी नियति
हालांकि यह भी सच है कि हर समय हर घड़ी
नहीं होता शुभ
किसी वस्तु का टूटने से रह जाना
यह टूटना ही वह सत्य है जिससे हमें होते जाना होता है
परिचित
न चाहते हुए भी
टूटने की क्रिया की स्वाभाविकता से हमें होना होता है बार-बार
दो चार
दरअसल अपने अंदर टूटने की विवशता ही
हमें खुद करती है प्रेरित कुछ न कुछ तोड़ने को
यदि नहीं कर पाते हम वैसा
तो हो जाते हैं किसी टूटने की खुशी में शरीक
टूटते जाना एक उत्सव है
टूटना है एक संगीत
अर्थ का अंतिम बिंदु
अनर्थ का चरम
दरअसल हमारा होना
टूटते जाने की एक क्रिया है
इस क्रिया में हमारा दिल बहलाव है कुछ न कुछ तोड़ते रहना
\हम एक सच को खेल में तब्दील करते रहते हैं
जो अपने टूटने से जितना खाता है खौफ़
तोड़ता है उतनी ही चीज़ें
वह उस बेचैनी को अभिव्यक्ति देता है जो है
उसके भीतर
हालांकि जब-जब वह खुश होता है अपनी किसी सफलता पर
वह नापता है अपनी ऊंचाई
तोड़ने का शक्ति परीक्षण कर
वह इस बात को अनचाहे ही स्वीकार करता है
कि तोड़ने की शक्ति ही उसकी कुल उपलब्धि है
जो विस्तार है
उसके भय का।

तुम मेरी नाभि में बसो

सांस की तरह ज़रूरी
कंधों की तरह मज़बूत
पांवों की तरह यायावर
ज़िल्दों की तरह बदलने वाले
ओ मेरे
चूकते-खोते-अपरिचित होते जाते-धूमिल विश्वास
तुम लौटो।

तुम लौटो
कि बहुत से काम अधूरे हैं
जनमने हैं बहुत से
\करनी है बहुत सी बातें
झिझकते अवरुद्ध होते गले से
किन्हीं हथेलियों पर मेहंदी की तरह सजना है
\एक इलाइची अदरख की चाय पीनी है
किसी से लिए आंधी की तरह उड़ना है
कटना है किसी की छत से एक पतंग की तरह
एक फ़ब्ती की तरह उछलना है सहसा
किन्हीं पहचाने ओठों से
इस उम्र की बेहिसाब रुई को
किसी तकली में कतना है
अन्त में एक विदा के हाथ की तरह
हिलना है बड़ी देर तक
आंसू की तरह सूख जाना है
गिरकर आंख से
तुम मेरी नाभि में बसो कस्तूरी की तरह
ओ मेरे विश्वास
तितली की तरह रंगीन विश्वास
धूप की तरह उजले
रंभाती गाय की तरह बेचैन
भरे हुए थनों की तरह दुहे जाने को आतुर
मेरे विश्वास
खंडित होते विश्वास
निर्वासित होते जाते
दंडित विश्वास, तुम लौटो।

पैसे फेंको

पुल आया
नदी के नाम
गंगा, कावेरी, सरयू के

करो नमन्
अइंछो अपने पाप-पुण्य पैसे फेंको
जो सम्बंध विसर्जित उनकी
स्मृतियों पर पैसे फेंको

पेट बजाता, खेल दिखाता, सांप नचाता एक संपेरा
रस्सी पर डगमग पांव सम्भाले उस बच्चे की हंसी की ख़ातिर
नेत्रहीन गायक, भिखमंगे, उस लंगड़े, लूले, बूढ़े
अंकवारों में लगे हुए दो बच्चे ले मनुहारें करती
युवती के फट गये वसन पर डाल निग़ाहें पैसे फेंको

दस पइसहवा, एक चवन्नी, छुट्टे बिन एक सगी अठन्नी
जेब टोहकर, पर्स खोलकर, अधरों पर मुस्कान तोलकर
त्याग भाव से, दया भाव से दिखा-दिखा कर पैसे फेंको

बिकती हुई अमीनाओं पर, रूप कुंवर की चिता वेदी पर
सम्बंधों की हत्याओं पर, धर्म के चमके नेताओं पर
मंदिर के विस्तृत कलशों पर, मस्ज़िद के ऊंचे गुम्बद पर
गुरद्वारे के शान-बान पर, सम्प्रदाय के हर निशान पर
शीश नवाकर पैसे फेंको, आंख मूंदकर पैसे फेंको

छीन लिए जायेंगे तुमसे बेहतर है कि खुद ही फेंको
जितने भी हों तत्पर फेंको, डर है भीतर पैसे फेंको
जान बचाओ पैसे फेंको, लूट पड़ी है पैसे फेंको

अनब्याही बहनों के कारक उस दहेज पर
बिन इलाज़ मां की बीमारी के प्रश्नों पर
बनिये के लम्बे खाते पर, टुटहे चूते घर भाड़े पर
रोज़गार की बढ़ती किल्लत
मुंह बाये त्यौहारों के शुभ अवसर से वंचित खुशियों के
नाम उदासी लिखकर उसकी गठरी पर कुछ पैसे फेंको
काम तुम्हारे क्या आयेगा यह भी खूब समझकर फेंको
मुक्ति पर्व यह पैसे फेंको
सपनों पर अब कफ़न की ख़ातिर पैसे फेंको

घर के होते घाट कर्म पर पैसे फेंको
मृत्युभोज अपना जीते जी सोच-सोच कर पैसे फेंको
इस समाज के ढांचे पिचके हुए कटोरे
थूक समझकर देकर गाली पैसे फेंको
कंठ से जैसे फूट रही धिक्कार तुम ऐसे पैसे फेंको
सब कुछ है स्वीकार तुम्हें तो पैसे फेंको
फिर-फिर, फिर-फिर पैसे फेंको।

निशान

किसी ने बताया
मेरी पीठ पर
पड़ गया है निशान किसी दीवार का
मैंने खोजा
कहां, आख़िर कहां, किसी दीवार के पीछे छिपकर बैठी है वह दीवार
जिसने चुपचाप मेरी पीठ पर छोड़ दी है अपनी छाप
और मैंने उसे पकड़ ही लिया एक दिन, उस नयी नयी रंगी हुई दीवार को रंगेहाथ
जब वह मेरी पीठ पर एक और निशान लगाने की कोशिश में थी
लेकिन मैं यह देखकर हो गया अचम्भित
उस दीवार पर पड़े थे मेरी पीठ के निशान
ग़नीमत तो यह थी कि किसी ने यह नहीं देखा
मेरी पीठ और दीवार का यह अनोखा रिश्ता
उस दिन से कई बार मुझे लगा
मेरी पीठ सहसा तब्दील हो जाती है दीवार में
और दीवार भी शायद बदल जाती हो मेरी पीठ में
मैं चुपके से अक्सर सहला आता हूं
उस दीवार को
जैसे मैं अपनी पीठ पर ही
हाथ फेर रहा होऊं।
——
डॉ.अभिज्ञात
परिचयः
जन्म-1962, ग्राम-कम्हरियां, पोस्ट दरियापुर नेवादां, ज़िला-आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा- हिन्दी में कलकत्ता विश्वविद्यालय से पीएच-डी।
प्रकाशित पुस्तकें-
कविता संग्रह-एक अदहन हमारे अन्दर, भग्न नीड़ के आर-पार, सरापता हूं, आवारा हवाओं के ख़िलाफ़ चुपचाप, वह हथेली, दी हुई नींद, खुशी ठहरती है कितनी देर। शीघ्र प्रकाश्य-बीसवीं सदी की आख़िरी दहाई।
उपन्यास- अनचाहे दरवाज़े पर, कला बाज़ार।
कहानी संग्रह-तीसरी बीवी, मनुष्य और मत्स्यकन्या।
भोजपुरी में भी लेखन।
देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओ में आलोचनात्मक टिप्पणियां भी प्रकाशित। रचनाएं कई भारतीय भाषाओं व अंग्रेज़ी में अनूदित। आकांक्षा संस्कृति सम्मान, कादम्बिनी लघुकथा पुरस्कार, कौमी एकता सम्मान, अम्बेडकर उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान, कबीर सम्मान एवं राजस्थान पत्रिका सृजन सम्मान से समादृत।
पेंटिंग व अभिनय का शौक। कुछेक कलाप्रदर्शनियों में भागीदारी। हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म चिपकू एवं बांग्ला फ़िल्मों एक्सपोर्ट:मिथ्ये किन्तु सोत्ती, एका एवं एका, महामंत्र, जशोदा एवं बांग्ला धारावाहिक ‘प्रतिमा’ में अभिनय।
पेशे से पत्रकार। अमर उजाला, वेबदुनिया डॉटकाम, दैनिक जागरण के बाद सम्प्रति सन्मार्ग में डिप्टी न्यूज़ एडिटर।
फ़ोन-09830277656 ईमेल-abhigyat@gmail.com

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1 Response

  1. बेहतरीन कविताएँ।

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