मुहम्मद अबयज़ ख़ान की दो नज़्म

ज़िक्र

तुझपे फ़क्र भी है
तेरा ज़िक्र भी है
तुझसे इश्क़ भी है
तेरी फ़िक्र भी है
तुझपे रश्क़ भी है
कश्मकश भी है

तू रफ़ीक़ भी है
तू अज़ीज़ भी है
तू सुबह सुबह है
तू शाम सी है
तेरी खुशबुएँ हैं
तेरी महक सी है

तेरी लज़्ज़तें हैं
तेरी छुअन सी है
तेरा सिलसिला है
तेरी याद भी है
तेरी महफिलें हैं
तेरी दोस्ती है

तू हसीन भी है
तू ज़हीन भी है
तेरा तज़किरा है
तेरा मशविरा है
तेरी रहबरी है
तेरा साथ भी है

तेरी शैतानियाँ हैं
तेरी शोखियां हैं
तेरे हसीन लब हैं
तेरी छुअन सी है
ये जो ज़िन्दगी है
बड़ी खुशनुमा है

तेरी मुहब्बतें हैं
तेरा फ़ैसला है
तेरी मंज़िलें हैं
तेरा रास्ता है
तू हमसफ़र है
मेरा हमनवां है

तुम एक ख्वाब हो

तुम्हारी शोख़ियाँ
वो बिंदासपन
तुम्हारा रूप रंग
वो अल्हड़पन
चंचल सी चपल
तीख़े नक़्श नयन
चाँद सी मूरत
गोरी सी सूरत
वो चेहरा कमल
हिरणी सा बल
वो होंठ गुलाबी
वो तेज आफ़्ताबी
कभी कोमल सी हंसी
कभी नाक पर गुस्सा
कभी इठलाना
कभी मुस्कुराना
सबको अपनी
बातों से हँसाना
कभी खुशियाँ
कभी आंसू
चेहरे पे नज़ाकत
बातों में शरारत
वो थोड़ी सी
तुनकमिज़ाजी
हज़ार ख़्वाहिशें
हज़ार ग़म
तुम्हारी हर अदा
लुभाती है
तुम्हारी हर बात
कुछ सिखाती है
क्योंकि तुम सिर्फ
महताब नहीं
तुम एक ख़्वाब हो..
तुम एक ख़्वाब हो..

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *