अबयज़ ख़ान की ग़ज़ल

बेवजह नहीं दीवार पे इल्ज़ाम लिखे हैं
हमने तो बस मंज़र ए आम लिखे हैं

तुमने पैदा की है हिन्दू मुसलमा की खाई
शहर शहर नफ़रतों के इश्तेहार लिखे हैं

तुम्हारी शफकतों के तलबगार नहीं हम
ख़ुदा ने किस्मत में बहुत इनाम लिखे हैं

हमारी वफ़ादारियों पर शक ना करो
अपने खून से हमने भी निज़ाम लिखे हैं

चाहकर भी हमारी हस्ती मिटा ना पाओगे
फलक के सितारों पे हमारे नाम लिखे हैं

बहुत खुशफ़हमियों में मुझे जीना नहीं आता
तुम्हारे भी मगर गिनती के दिन चार लिखे हैं

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