मुहम्मद अब्यज ख़ान की 3 ग़ज़लें

 

ज़िन्दगी इतना एहसान तो कर

ऐ ज़िन्दगी इतना एहसान तो कर
जीने के रास्ते थोड़े आसान तो कर

हम कौन सा तुझसे शिकवा करते हैं
मुस्कुराने के कुछ इमकान तो कर

पत्थर बांधकर हम तो जी लेंगे मगर
बच्चों की भूख का इंतज़ाम तो कर

मसनदों पे सोने वाले बहुत बैचैन हैं
हमारी नींद का कुछ एहतराम तो कर

माना के तेरा हमसफ़र नहीं हूँ मैं लेकिन
कुछ दूर साथ चलने का एहसान तो कर

डर

ना मोहल्ला ना आँगन ना दीवारो दर है
बंद कमरों में एक अंजान सा डर है ।।

बिजलियों की चकाचौंध, महफ़िल में रंग है
बड़े शहर में फिर भी अकेलेपन का डर है।।

जहाँ अदालत गूंगी और अँधा है क़ानून
ना खुदा का खौफ़ है, ना सज़ा का डर है।।

फुटपाथ पर कटती हैं यहाँ कितनी ही रातें
अब ना जीने की ख़्वाहिश ना मरने का डर है।।

कैसा ये शहर है, कैसे इस शहर के लोग
जहाँ इंसानों के बीच हैवानियत का डर है।।
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बचपन

ज़िन्दगी की किताबों से पुराने हर्फ मिटाते हैं
चलो फिर से एक नया बचपन बसाते हैं

ले आओ गिल्ली डंडे और खेल कंचों का
चलो फिर से नई शैतानियां सिखाते हैं

लूडो में बेमानियां, शतरंज की चालाकियां
चलो एक बार फिर से छत पे पतंगें उड़ाते हैं

मई जून की गर्मी में फिर गायब हो जाते हैं
चलो सज्जन की बगिया से अमिया चुराते हैं

सावन की बारिश में फिर से भीग जाते हैं
चलो आँगन के पीपल पर झूला लगाते हैं

बारिश के पानी में फिर नाव चलाते हैं
चलो आसमां से फिर तारे तोड़ लाते हैं

माँ को फरमाइशों की नई फेहरिस्त थमाते हैं
चलो पापा के संग बल्ले से नए शॉट लगाते हैं

रेहमत की ईदुलफितर और शंकर की दीवाली
चलो छुटकी को फिर से राखी पे चिढ़ाते हैं

हाथों की सब लकीरों को एक बार मिटाते हैं
चलो किसी पंडित से नई किस्मत लिखाते हैं

बचपन की मुहब्बत को फिर ढूंढ लाते हैं
चलो मुहल्ले की गलियों में महबूब को मनाते हैं

जितने बैर अब तक थे, सब को मिटाते हैं
चलो एक बार फिर से बच्चा बन जाते हैं
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