गर्म राख में सुबकती ग़ज़लों में आक्रोश का तेवर

अदम गोंडवी की ग़ज़ल- पुस्तक “समय से मुठभेड़” की समीक्षा

दीप नारायण ठाकुर

जब कोई पाठक किसी रचना को पढ़ता है और यह महसूस करता है कि यह तो उसके आसपास की है , उसकी ज़िंदगी से , लोगों की ज़िंदगियों से जुड़ी हुई है तो समझना चाहिए कि रचनाकार का श्रम सार्थक हो गया है .

एक ज़माना था जब उर्दू के प्रतिष्ठित शायर और आलोचक अल्ताफ हुसैन ‘हाली’ तथा उनके समकालीन शायरों ने आवाज़ बुलंद करते हुए कहा था कि ग़ज़ल को तबले की धनक और घुंघरूओं की क़ैद से आज़ाद कर मानवीय जीवन और उसकी समस्याओं से जोड़ा जाना चाहिए .मनुष्य के जीवन में जो परिवर्तन और इंक़लाब जन्म लेते हैं , ग़ज़ल इनसे सीधे आँख मिलाने का साहस रखती है .
ऐसे में # अ द म गों ड वी का ग़ज़ल-संग्रह ” स म य से मु ठ भे ड़ ” गौरत़लब है .किसी भी संकलन का औचित्य उसमें छपी रचनाओं की जीवन्तता में होता है … जीवन से रचनाओं के सरोकार जीवन्तता काआधार है .प्रबुद्ध पाठक वर्ग को ग़ज़ल-संग्रह ” स म य से मुठ भे ड़ ” में पीढ़ी दर पीढ़ी होने वाले राजनीतिक , सामाजिक , आर्थिक तथा सांस्कृतिक परिवर्तनों की झलक ग़ज़ल में अवश्य नज़र आएगी … यही ग़ज़ल की श्रेष्ठता और महानता है … यही उसके विस्तार और उसकी जीवंतता की कुंजी है ….

“मानवता का दर्द लिखेंगे.
माटी की बू बास लिखेंगे..

हम अपने इस कालखण्ड का,
एक नया इतिहास लिखेंगे .

तुलसी इनके लिए विधर्मी ,
देरीदा को ख़ास लिखेंगें .”

दरअसल “अदम ” का दर्द मानवीय पीड़ा की अभिव्यक्ति है … यही ‘पीड़ा ‘ उसकी ग़ज़लों को जीवंतता प्रदान करती है … यह स्थिति समूचे भोगे हुए यथार्थ के बीच से जन्म लेती है .अनुभव-बोध से अगर इस विरोध का संबंध न होता तो यह रचना के नाम पर नारेब़ाजी के रूप में आसानी से स्खलित हो जाता ….

“आप कहते हैं सरापा ग़ुलमुहर है ज़िंदगी
हम ग़रीबों की नज़र में इक क़हर है ज़िंदगी

भुखमरी की धूप में कुम्हला गईअस्म़त की बेल ,
मौत के लम़्हात से भी तल्ख़तर है ज़िंदगी.

घर में ठण्डे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है ,
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है .
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी,
सुब्हे फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है.
सुलगते ज़िस्म की गर्मी का फिर अहसास हो कैसे ,
मुहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है .

जैसी मृत स्थिति का जीवंत चित्र आंकने वाले ‘अदम’ एक शेर में यह राय भी देते हैं कि ….

मेरी नज़्मों में मशीनी द़ौर का अहस़ास है,
भूख के शोलों में जलती क़ौम का इतिहास है .
मज़हबी दंगों के शोलों में शराफ़त जल गई,
फ़न के दोराहे पे नंगी द्रौपदी की लाश है.

ये विद्रूपताओं के सतत विषदंश से निश्चेष्ट होती जा रही मानवीय संवेदना की शिराओं में पीयूष धारा प्रवाहित करने वाली सोद्देश्य ग़ज़लें हैं … ‘अदम’ की ग़ज़लों में व्यर्थ का बड़बोलापन और लफ़्फाजी नहीं है … उनकी ग़ज़लों से गुजरते हुए भी सादगी व भोलापन मुग्ध करता है और आश्वस्त भी … जिस मिज़ाज और अंदाज़ेबयाँ की बात निरंतर की जाती रही है , वह इन ग़ज़लों में आश्वस्ति के साथ सामने आता है .

इलेक्शन भर म़ुसलमानों से हम रूम़ाल बदलेंगे,
अभी बदला है चेहरा देखिए अब चाल बदलेंगे .
मिले कुर्सी तो दलबदलू कहो क्या फ़र्क़ पड़ता है ,
ये कोई वल्द़ियत है पार्टी हर साल बदलेंगे .

इनसान काले गोरे के ख़ेमे में बँट गया ,
तहज़ीब के बदन पे सियासी लिब़ास है.
रोटी के लिए बिक गई धनियाँ की आब़रू ,
लमही में प्रेमचन्द का होरी उदास है .

भुखमरी की रूत में नग़्मे लिख रहे हैं प्यार के,
आज के फ़नकार भी हैं दोग़ले क़िरदार के.
दोस्तो इस मुल्क़ में ज़म्हूरियत के नाम पर ,
सिक्के कितने दिन चलेंगे एक ही परिवार के .

अदबग़र ज़िंदगी के दायरे से दूर होता है ,
तो वह तहज़ीब के सीने में इक नासूर होता है .
रवायत आहनी ज़ंजीर बन जाती है पाँवों की ,
बग़ावत के लिए इनसान फिर मज़बूर होता है .

‘अदम गोंडवी’ ने अपनी ग़ज़लों को जहाँ-जहाँ हिन्दी का मुहावरा दिया है , वहाँ समकालीन यथार्थ का मंज़र उपस्थित हुआ है … वहाँ ग़ज़लें रिवायती-रूमानीयत से हट कर विसंगतियों को उघाड़ने में क़ामयाब हुई है… वहाँ ये ग़ज़लें समय का सच हो गई है . ‘अदम गोंडवी’ के ग़ज़ल-संग्रह ” समय से मुठभेड़” में लगभग सरसठ ग़ज़लें संग्रहित हैं …  इन ग़ज़लों की तराश , बुनावट और शिल्प ऐसा है कि ये ग़ज़लें सघन अनुभवोँ और गहरी संवेदना दस्तावेज़ मालूम पड़ती है … बिम्ब-प्रतीकों के अनूठे प्रयोग , बहरों का ख़ूबसूरती और समझदारी से चयन , कहन(अंद़ाजेबयाँ) में विशिष्टता ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लों को आद़मक़द बनाती है … जो लोग अलफ़ाज़ की ‘जगलरी’ करते हैं उनके लिए ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लें मौज़ूं है और कटाक्ष भी .वास्तव में ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लें संयत आक्रोश , मुखर प्रतिपक्ष , गहन संवेदनशीलता और सुनियोजित चिंतन से ओतप्रोत है … इन ग़ज़लों में मानवीय अवसाद , आशा-आकांक्षा का इतिहास तो है ही वहाँ के भूगोल द्वारा जीवन पर पड़े थपेड़ों के निशान भी पूरी तरह अंकित है … इस सबसे बढ़ कर इन रचनाओं में वहाँ का समाजशास्त्र भी झांक-झांक जाता है …

सौ में सत्तर आद़मी फ़िलहाल जब नाश़ाद है ,
दिल पे रखके हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है .
कोठियों से मुल्क़ के मेआर को मत आंकिए,
असली हिन्द़ुस्तान तो फ़ुटपाथ पर आब़ाद है .
यह ग़ज़ल म़रहूम मंटो की नज़र है दोस्तों,
जिसके अफ़साने में ठंडे गोश्त की रूदाद है .

—विजय बहादुर सिंह के शब्दों में , वे अपने शहराती-लेखकों को अपने देहाती ढब से विस्मय में डाल देते थे … बड़ी-बड़ी मूँछे , गठा हुआ बदन और कविता हीन चेहरा धूमिल को सबसे अलग ले जाता था , ठीक ओम पुरी या नसीरुद्दीन शाह की तरह … ‘अदम’भीतर से नसीरुद्दीन शाह की तरह सचेत और गंभीर हैं … धूमिल की तरह आक्रामक और ओम पुरी की तरह प्रतिबद्ध.
—- जगदीश पीयूष के शब्दों में , ‘अदम’ की ग़ज़लें सर्वहारा की लड़ाई ख़ुद लड़ती हैं, कभी विधायक निवास में , कभी ग्राम प्रधान के घर , कभी वंचितों , पीड़ितों की गली में , कभी खेतों के बीच पगडंडी पर अन्याय के विरूद्ध… !

संग्रह की ग़ज़लें निश्चित ही वर्तमान युग की विभीषिकाओं , संत्रासों , आकांक्षाओं को अपने कलेवर में व्यक्त करती है … इन ग़ज़लों का तेवर विद्रोही मुद्राओं को अपना कर आक्रोश को सहज वाणी प्रदान करता है .
‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लें व्यापक पाठक वर्ग द्वारा पसंद किये जाने के साथ-साथ सुधीजनों को आकर्षित करेंगी ऐसा विश्वास है … इतना निश्चित ही कहा जा सकता है कि ग़ज़ल के ढांचे में हिन्दी और भारतीय संदर्भों और संस्कृति के गहरे रंग भरने की दिशा में “अदम गोंडवी ” की ग़ज़लों का स्थान उल्लेखनीय रहेगा ….. !!

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