हेमन्त वशिष्ठ की कविता ‘आधी बची है रात ‘

कविता : हेमन्त वशिष्ठ

फोटो : पंकज जैन

 

एक लफ्ज़ भिजवाया है …

ढलती शाम के साथ…

लिख रहा हूं बाकी पयाम…

अभी आधी बची है रात…

हर पहर से इकरार है

इंतज़ार का …

आहिस्ता आहिस्ता…

हर लम्हा चुन रहा है अल्फाज़…

एक लफ्ज़ भिजवाया है …

ढलती शाम के साथ…

लिख रहा हूं बाकी पयाम…

अभी आधी बची है रात …

हरफ उठा लेना तुम …

स्याही बदल – बदल कर

भेजी है बैरंग लिफाफों में

हर मुख्तसर सी मुलाकात…

एक लफ्ज़ भिजवाया है …

ढलती शाम के साथ…

लिख रहा हूं बाकी पयाम…

अभी आधी बची है रात …

मजमून पर ना जाना…

तुम ही तो हो इबारत…

आज पयाम में भेजी है तुम्हें…

फिर वही पूनम की रात…

फिर वही पूनम की रात…

एक लफ्ज़ भिजवाया है …

ढलती शाम के साथ…

भेजी है बैरंग लिफाफों में

हर मुख्तसर सी मुलाकात…

आज पयाम में भेजी है तुम्हें…

फिर वही पूनम की रात…

एक लफ्ज़ भिजवाया है …

ढलती शाम के साथ…

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