‘ऐनुल’ बरौलीवी की दो ग़ज़लें

एक

जो लगी है आग़ दिल में आज बुझनी चाहिए
ज़िन्दगी अब तो मुहब्बत से बदलनी चाहिए

मुश्क़िलें बढ़ती गई अब ज़िन्दगी कटती नहीं
या खुदा मेरी अभी किस्मत सँवरनी चाहिए

दुश्मनों ने इस क़दर वीरान कर डाला मकाँ
आग़ नफ़रत की नहीं फिर से सुलगनी चाहिए

प्यार का दामन पकड़कर सब रहें अब उम्र भर
ज़िन्दगी भर अब नहीं किस्मत बिखरनी चाहिए

चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रातें यहाँ
तीरगी जी जान से यारों मिटानी चाहिए

भून दो अब गोलियों से आज दहशतग़र्द को
ज़िन्दगी सुख चैन से अब तो गुज़रनी चाहिए

मंज़िलों को ज़िन्दगी में है तुझे पाना अग़र
हौसले की आग़ तेरे दिल में जलनी चाहिए

आज होली ईद भी मिलकर मनाओ साथ तुम
दूरियाँ सबके दिलों की रोज घटनी चाहिए

आदमी दुख दर्द सबका बाँट ले मिल बैठकर
अब नहीं तलवार गर्दन पर लटकनी चाहिए

दिल की क्यारी में सभी मिलकर खिलाओ फूल तुम
अब मुहब्बत दिल में ‘ऐनुल’ फिर मचलनी चाहिए

दो

हर इक ज़ख़्म दिल का छुपाना पड़ा है
हमें अपना ग़म भूल जाना पड़ा है

उन्हें आज दिल में बसाने चले जब
मुझे झूठ को सच बनाना पड़ा है

उन्हें है गुमां आज सूरत की अपनी
हमें आइना फिर दिखाना पड़ा है

हमारी मुहब्बत पता चल न जाए
जमाने से इसको छुपाना पड़ा है

छुपाकर हमें अश्क़ आँखों में अपनी
लबों पे हँसी को सजाना पड़ा है

चले वो गये प्यार अपना भुलाकर
मग़र प्यार का ख़त पुराना पड़ा है

मुसीबत बनी ज़िन्दगी आज मेरी
मग़र ज़िन्दगी को निभाना पड़ा है

तेरा दर्द अबतक बसा है जिग़र में
क़दम से क़दम फिर मिलाना पड़ा है

तेरे प्यार को आज पाने से पहले
बहुत कुछ मुझे भी लुटाना पड़ा है

जमाने से छुपकर मिले आज कैसे
सनम की गली भूल जाना पड़ा है

कहीं फिर मुहब्बत न रुस्वा हो ‘ऐनुल’
अभी तक बहुत कुछ गँवाना पड़ा है

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