डाॅ. अजय पाठक के दस गीत

मजदूर-कटारों की

कौन यहाॅ सुनता है
हम मजदूर-कहारों की।

खून पेर कर, करें पसीना
क्या गर्मी-सर्दी
हक मांगो तो लाठी मारे
हमको ही वर्दी

जुल्म जबर झेला करते है
हम सरकारों की

मेहनत अपनी, हुकुम तुम्हारा
मालिक तुम हुक्काम
बारह घंटे भठ्ठी झोंके
फिर भी नमक हराम!

नीयत हम भी समझ रहे हैं
तुम मक्कारों की

श्रम अनमोल हुआ करता है
यह बतलायेंगे
मुठ्ठी भींच तुम्हारे सम्मुख
जब भी आयेंगे

तब हम खड़कायेंगे कुंडी
सांकल द्वारों की

कोठी बंगले तानों भर लो
माल तिजारी में
हमको हासिल सूखी रोटी
दाल कटोरी में

अभी तुम्हारे दिन हैं
लूटो मौज बहारों की
बहुत हो गया जुल्म सहेंगे
ना सहने देंगें
पूॅंजीवाद तुम्हे धरती पर?
ना रहने देंगे

पैनी धार करेंगे हम भी
अब हथियारों की
यौवन के दिन बीते
मधुरस के छत्तों से जैसे
बूँद-बूंद रस रीते
यौवन के दिन बीते।

अब नयनों के नीलझील में
सपने नहीं अमाते
कभी नहीं लगता बगियों में
मोर-पपीहा गाते
घूम रहे वैराग वनों में
दुर्लभ हुए सुभीते।

नहीं बहकते पाँव गली के
ओर-छोर तक जाकर
दम लेता है संयम सीधे
घर तक ही पहुँचाकर
जीत-जीत कर हारे मन को
हार-हार कर जीते।

समय काटना लक्ष्य हुआ है
अब तो जीवन का
समीकरण भी टूट रहा है
जर्जर तन-मन का
तार-तार हो रही चदरिया
बैठ गये हम सीते।

यौवन के दिन बीते।

सुनो तथागत

सुनो तथागत !
बोधिवृक्ष पर
अब कौंऔ की कांव-कांव है

पंचशील अब कैद हो गया
है पुस्तक में
भिक्षुक-भंते समय काटते
है बक-झक में
देवदत्त से भरे हुए अब
गांव-गांव है

शाक्यवंश ने अत्याचारी
राजा जनमे
दया-मोह का भाव नही है
उनके मन में
आंखों में अंगार होठ पर
खांव-खांव है

मठ में लंपट साधक बनकर
जमे हुए है
भोग-विलासों में सबके सब
रमे हुए है
मारा-मारी, गहमा-महमी
चांव-चांव है

‘‘बुद्धं शरणम् गच्छामि’’ की बातें छूटी
कच्ची थी जो डोर आस की
वह भी टूटी
बोधगया के पथ में कांटे
पांव-पांव है

सुनो तथागत !
बोधिवृक्ष पर
अब कौंऔ की कांव-कांव है

दिन

ठेठ गंवइहा भद्दी-भद्दी
गाली जैसे दिन।

दिन! जिसको अब वर्तमान का
राहू डसता है
दुख-दर्दों का केतु भुजपाशों में
कसता है

आते-जाते याचक और
सवाली जैसे दिन।

दिन जब उजियारों का ही
पर्याय कभी था
तभी तलक उसकी महता थी
न्याय तभी था

निर्धन के दुःस्वप्न किसी
बदहाली जैसे दिन।

दिन जो अपनी भूख मिटाने
रोटी मांगे

दुनिया जिसकी जुगत बिठाने
दौड़े-भागे।

रोटी से वंचित भिक्षुक की
थाली जैसे दिन।

दिन जाता है मयखानों के
द्वार खोलकर
साकी जाम पिलाने लगती
तोल-मोल कर

हाहा-हीही करते किसी
मवाली जैसे दिन।
आज

तुम जियो कल के लिये
हम जी रहे है आज में

धडकनों पर कर लगाया
और तुम सोते रहे
हम यहां खुद ही हमारी
लाश को ढोते रहे,

सांस की किश्तें चुकायीं
प्राणधन के ब्याज में।

कंठ पर पहरा बिठाकर
चाहते हो कुछ कहें
हो भले सामर्थ्य पर
औकात में अपनी रहें,

तो सुनो प्रतिरोध भी है
कांपती आवाज में!

हाथ अपने कांपते हैं
किन्तु हम चैतन्य हैं
हम अभागेे, दीन, दुखिया
आप लेकिन धन्य है,

हौसले से जी रहे हम
राजसी अंदाज में

सत्य की सौगंध लेकर
झूठ की अतिरंजना
और हमसे चाहते
कि हम करें अभ्यर्थना

क्या यही दिन देखना था
राम जी के राज में?

कबीर

दो पहियों के आगे खुद को
जोते हुए कबीर
मैंने देखा सबका बोझा
ढोते हुए कबीर ।

खस्ता हालत, फाका-मस्ती
लेेकिन मगन दिखे
जीने का अंदाज पुराना
जिसमें लगन दिखे

महानगर की फुटपाथों पर
सोते हुए कबीर।

दुनिया भर का दर्द समेटे
अपने सीने में
व्यस्त रहा करते हैं सबका
आँसू पीने में

दीन-हीन के दुख से कातर
रोते हुए कबीर।

बातें करते लाख टके की
लेकिन सुनता कौन ?
आहत हैं अब, और उन्होंने
साध लिया है मौन

थोड़ा-थोड़ा करके खारिज
होते हुए कबीर।

सबके भीतर ज्वाला दहके
बाहर कलुष भरा
चंदन जैसा तन महके, पर
भीतर मैल भरा

लिये बुहारी कीच-काच को
धोते हुए कबीर।

मैंने देखा सबका बोझा
ढोते हुए कबीर।

 

इन्द्रसभा
यह मत पूछो, इंद्रसभा से
क्या-क्या अनुभव लेकर आये

किये चाकरी देवजनों की
सुनते सौ फरमान
हुकुम बजाते जीवन बीता
बने रहे दरबान
रंभाओ के नखरे झेले
धन-कुबेर के पांव दबाये

सोमरसों के प्याले भरते
और सजाते सेज
बाम्हन होकर मांस परोसे
क्या करते परहेज

मदिरापेयी मारूतों को
यशकीर्ति के गीत सुनाये

उर्वशियों की डोली हांकी
दिन में सौ-सौं बार
अंतःपुर से राजसभा तक
दौडे़ बारम्बार

एक भूल पर गंधर्वो से
भद्दी-भद्दी गाली खाये

महाविलासी इंद्रपुत्र की
करते जय-जयकार
ईश्वर जाने कब रख दे वह
गर्दन पर तलवार

गौशालों की साफ-सफाई
घुड़सालों की लीद उठाये।

समकालीन

युगबोधी चतुराई सीखी
समकालीन हुए।

अंधेयुग में काम नहीं
आती है चेतनता
बुद्धिमान हो जाने भर से
काम नहीं चलता
पढ़े पेट का राम पहाड़ा
रीढ़विहीन हुए।

अपने कँधे पर नाहक
ईमान नहीं ढोते
अब हम छप्पनभोग दबाकर
देर तलक सोते
इनकी-उनकी चारी-चुगली
में तल्लीन हुए।

दंडकवन की पर्णकुटी में
तपना छोड़ दिया
नैतिकता की रामकहानी
जपना छोड़ दिया
अवसर आया तो आसन पर
हम आसीन हुए।

युगबोधी चतुराई सीखी
समकालीन हुए।

युधिष्ठिर

कौन-कौन से यक्ष प्रश्न का
उत्तर दोगे कहो युधिष्ठिर ?

जनपथ पर कोहराम मचा है
बेबस राजमहल
सौदागर बन गये सिपाही
मारी गई अकल
शत्रुपक्ष ने संधिपत्र पर
समझौते लिखवाये
नीति नियम क्या राजदंड भी
कौड़ी मोल बिकाये।
किन लोगों से क्या बोलोगे
अच्छा है चुप रहो युधिष्ठिर।

कहाँ धूर्त अमात्य हो गया
मंत्री हुआ विलासी
पड़ी डकैती राजकोष पर
धन की हुई निकासी
प्रजाजनों को टुकड़े देकर
किसने मौन कराया ?
जिसने भी आवाज उठाई
उसने प्राण गँवाया
देखो, समझो, किन्तु व्यथा को
भीतर-भीतर सहो युधिष्ठिर।

राजपुरोहित कहाँ फेंक
आये हैं कंठी-माला
बातों से लंपटता टपके
आँखों से मधुशाला
हवन, यज्ञ, समिधा के बदले
उर्वशियों के फेरे
गुरूकुल के परिसर लगते हैं
बकासुर के डेरे
वर्णाव्रत में यही उचित है
अपना रस्ता गहो युधिष्ठिर।
समय तेंदुआ

समय तेंदुआ बैठे-बैठे
घात लगाता है

बड़े धैर्य से करे प्रतीक्षा
कोई तो आये
आये तो फिर आकर कोई
जिंदा मत जाये
मार झपट्टा एक बार में
धूल चटाता है

चाल तेज है, भारी जबड़े
बरछी से नाखून
हिंसा उसका नेम-धरम है
हिंसा है कानून
चीख निकलती, जब गर्दन पर
दांत गड़ाता है

दांव-पेंच में दक्ष बहुत है
घातक बड़ा शिकारी
कितनी हो सार्मथ्य, सभी पर
यह पड़ता है भारी
चालाकी, चतुराई का फन
काम न आता है

आदिकाल का महाशिकारी
अब तक भूखा है
पेट रिक्त है, कंठ अभी तक
इसका सूखा है
मास नोच लेता है सबका
हाड़ चबाता है

समय तेंदुआ बैठे-बैठे
घात लगाता है

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परिचय

डाॅ. अजय पाठक

जन्म: 14 जनवरी 1960

पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक, प्राणीशास्त्र, हिन्दी साहित्य, समाजशास्त्र, भारतीय इतिहास में स्नातकोत्तर, इतिहास में डाक्टोरेट।
मूलतः कवि, अब तक पन्द्रह गीत संग्रहों के अलावा इतिहास पर एक ग्रंथ ‘मुगलकाल में शिक्षा, साहित्य एवं ललित कला’ और कवि हरिवंशराय बच्चन की लोकप्रिय कृति ‘मधुशाला’ के दर्शन पर आधारित ग्रंथ ‘तेरी मेरी मधुशाला’ के साथ ही ‘पं. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल और उनका साहित्यिक अवदान’ प्रकाशित।
काव्य संग्रह ‘मंजरी’ एवं छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधि गीतकारों की रचनाओं का संग्रह ‘छत्तीसगढ़ के सरस स्वर’ तथा देश के स्थापित एवं नवोदित गीत कवियों के संग्रह ‘सापेक्ष 56’ का संपादन।
देश के अनेक प्रतिनिधि काव्य संकलनों एवं वेब पत्रिकाओं में रचनाओं का समावेश, जंगल एवं प्रकृति, भारतीय दर्शन और वर्तमान सामाजिक विसंगतियों, गरीबी, अभाव, नैतिक मूल्यों के हा्रस तथा राजनैतिक अधोपतन पर प्रहार करती इनकी छंदबद्ध रचनायें अत्यंत सराही जाती है।
कहानी, उपन्यास, समीक्षा, व्यंग्य एवं निबंध लेखन में भी समान अधिकार। आकाशवाणी एवं टेलीविजन पर रचनाओं का सतत् प्रसारण, छत्तीसगढ़ी, पंजाबी और अंग्रेजी में कविताओं का अनुवाद, अनेक आॅडियो एवं वीडियो एल्बम्स में गीतों का समावेश।
साहित्यिक उपलब्धियों के लिये देश एवं प्रदेश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
गीत संग्रह ‘जंगल एक गीत है’ को भारत सरकार का प्रतिष्ठित ‘मेदिनी पुरस्कार’ प्राप्त।
साहित्य पत्रिका ‘नये पाठक’ के सम्पादक।

सम्प्रति: छत्तीसगढ़ शासन में नापतौल विभाग के प्रमुख
सम्पर्क: एल-3, विनोबानगर, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
पिन-495004, मोबाइल: 098271-85785
ई-मेल: ajaypathak905@gmail.com

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