अजमेर अंसारी ‘कशिश’ की एक ग़ज़ल

पस्ती में जिसने माना के तदबीर इश्क़ है
पहुँचा बुलन्दियों पे तो तक़दीर इश्क़ है !

क्यों देखूँ इस जहान कीं रंगीनियाँ तमाम
मेरी नज़र में यार की तस्वीर इश्क़ है

हर लम्हा आता–जाता बताता है दोस्तो
दुनिया है एक ख़्वाब तो ताबीर इश्क़ है

मुझ सा कोई गनी नहीं सारे जहान में
आशिक़ हूँ मेरे वास्ते जागीर इश्क़ है

मिलकर न तोड़ पायेगीं दुनिया की ताकतें
हम आशिकों के पाँव की जंज़ीर इश्क़ है

महका ज़ख़म तो हो गया अहसास ये मुझे
जो दिल के आर-पार है वो तीर इश्क़ है

कुछ इस तरह अयाँ हुआ मुझपे ये फ़लसफ़ा
दामन पे टपका आँख से जो नीर इश्क़ है

मन्ज़िल हमारे पाँव की ठोकर में आयेगी
ग़र ज़िन्दगी की राह का रहगीर इश्क़ है

ये है सुबूत मेरी वफ़ाओं का ऐ “कशिश”
खूँ–खेज़ मेरी नज़रों में शमशीर इश्क़ है

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