रूपेश कश्यप की सच्ची कविताएं

राकेश कायस्थ

 

कुछ कविताएं अच्छी होती हैं। कुछ कविताएं कच्ची होती हैं लेकिन ज्यादातर कविताएं सच्ची होती हैं। ऐसी ही एक सच्ची कविता से पिछले दिनों मुलाकात हो गई-

नन्ही-सी उम्र से ही हमारा
नन्ही चवन्नियों से याराना था
वो भी क्या खूब ज़माना था
कि हर बाजी पर चवन्नी कमाना था
मगर जब से अपने देश की इकोनॉमी बूम हो गई
हमारी प्यारी चवन्नी कहीं गुम हो गई

गुम हुई चवन्नी की कसक हर उस दिल में है जिसने पिछले पच्चीस साल में एक सदी जितने बड़े बदलाव देखे हैं। रूपेश कश्यप भी उसी पीढ़ी के नुमाइंदे हैं। संघर्ष में तपे, रूमानी सपने देखते हुए भी जगे। झारखंड के एक छोटे से कस्बे से निकलकर इलाहाबाद पहुंचे, इलहाबाद से दिल्ली का रुख किया और सपनो का पीछा करते हुए आखिरकार मायानगरी आ पहुंचे। विज्ञापनों की दुनिया में लोग उन्हे एक स्टार कॉपी राइटर के तौर पर जानते हैं, जिनके खाते में कई अवार्ड विनिंग कैंपेन दर्ज हैं। एक सुपर सॉफिस्टिकेटेड कॉरपोरेट एनवायरमेंट में कस्बे के किसी आदमी का जगह बना पाना आसान नहीं है। लेकिन क्या जगह बना लेना ही सबकुछ है? ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है! बहुत कुछ ऐसा है, जो शिखर पर बैठे एक आदमी को भी कचोटता है, सालता है, अगर उसके पास शायर वाला दिल हो। ज़रा रूपेश की एक कविता `जिंदगी एक चूहा दौड़’ की कुछ लाइने देखिये..

भांपकर मौका, चांप ले गर्दन
मुस्कुरा ले प्यारे मन ही मन
क्योंकि जो ना घोंपे छुरा पीठ में
वो साला बुजदिल कमज़ोर है
दौड़ है, जिंदगी चूहा दौड़ है..

जिंदगी रैट रेस है। लेकिन जिंदगी सिर्फ रैट रेस नहीं है और भी बहुत कुछ है। निदा फाजली ने पाने, खोने और खोजने को सांसों का इतिहास कहा था। पाने, पाकर खोने और खोकर फिर से खोजने की पूरी यात्रा रूपेश कश्यप के काव्य संग्रह अलगोज़ा में देखने को मिलती है। अलगोज़ा उत्तर-पश्चिमी भारत में बजाया जानेवाला एक ऐसा वाद्ययंत्र है, जिसमें दो-दो बांसुरियां होती हैं। वादक को सांस की लय बरकरार रखते हुए दोनो हाथों की उंगलियों से सुरो को साधना होता है। जीवन अलगोजा जितना जटिल है, लेकिन उतना ही सुरीला भी। रूपेश की कविताओं में जिंदगी के ये तमाम रंग दिखाई देते हैं, इनमें प्रेम की कोमलता भी और समाज में बढ़ते नफरत की शिनाख्त भी।

एक हिंदू कट आउट कहता है `ईद मुबारक’
एक मुसलमान कट आउट कहता है `नवरात्र की शुभकामनाएं’
सच पूछो तो अपने हिंदू-मुसलमान से बेहतर उनके कट आउट्स हैं
बहुत अच्छे, बहुत बड़े हैं
दंगों के बाद भी चौराहो पर निडर खड़े हैं

मैं हिंदी का आलोचक नहीं हूं। सिर्फ पाठक हूं और इस नज़रिये मुझे रूपेश की कविताएं सच्ची भी लगी और अच्छी भी। रचनाकार को असली पाठक तक पहुंचाने की जो कोशिश हिंद युग्म प्रकाशन कर रहा है, उसकी सराहना की जानी चाहिए। अलगोजा ऑनलाइन उपलब्ध है। आखिर में रूपेश की कुछ और सच्ची लाइने–

एक ऐसे समय में
जब शब्द खोने लगे हों अपने अर्थ
तो बहुत मुमकिन है कि
मैं कह सकूं तुमसे इतना ही `मैं तुम्हारा’

अलग़ोज़ा : द्वन्द्व और दौड़ की धुन

प्रकाशक : हिन्द युग्म

मूल्य :  140 रूपए (हार्डकवर)

ऑनलाइन उपलब्ध है

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