डा.अमरजीत कौंके की 12 क्षणिकाएं

अमरजीत कौंके 
1
सुरमई संध्या को
हरी घास पर 
उस की आँखों में देखते 
 
सोचा मैंने-
 
अगर सारी जिंदगी यूँ ही गुज़रती 
तो बस क्षण भर की होती….
 
2
सुरमई संध्या को 
हरी घास पर उसके पास बैठे 
मैंने कहा उस से –
 
कोई बात करो
 
वह बोली –
जब ख़ामोशी ख़ामोशी से संवाद कर रही हो
तो शब्दों को निरर्थक गँवाने का क्या फायदा ?
 
3
तुम मेरे हाथ की रेखा थी 
खुदा ने गलती से किसी 
और हाथ पर खींच दी
खुदा की इस गलती की सज़ा 
पता नहीं हम कितने जन्म 
और भुगतें……
 
4
दुःख था 
अंत की थी भूख
लेकिन मैं 
खुश हो जाया करता था 
कविताएँ लिख कर
 
अब ख़ुशी चहचहाती 
सुबह हँसती शाम गाती
लेकिन मैं अंत का उदास
 
कई बार दुखों के बिना भी
दुखी हो जाता है आदमी……
 
5
आज का दिन 
तुम बुझ जाओ 
ऐ सूरज !
मेरी महबूब के 
चेहरे का तेज़ काफी है
ब्रह्माण्ड को रोशन करने के लिए….
 
6
टूट गया हूँ 
तुमसे जुड़ने की कोशिश करते करते
तुम्हें पाने की लोचा में 
खुद को खो बैठा हूँ मैं……
 
7
मैंने जो हवा में
तुम्हारे लिए उछाला था चुम्बन
वह फ़िज़ा में भटक रहा है
तुम उसे उसकी जगह दे दो
 
वह चुम्बन 
अपनी जगह ढूँढता है….
 
8
मेरा प्यार उस पर 
कुछ इस तरह बरसता है
जैसे किसी पत्थर पर 
लगातार पानी का झरना गिरता है
 
काश ! 
उसे कभी
प्यार में 
किसी बृक्ष की भांति
भीगने की
कला आ जाए……
 
9
बारिश जब बाहर होती 
तो कैसे निखर जाता आकाश
प्यासी पृथ्वी भीतर तक 
भीग जाती
 
काश !
बारिश ऐसी कभी 
मनुष्य के भीतर भी हो…….
 
10
तितली
उड़ती उड़ती आई
आकर पत्थर पर बैठ गयी
 
पत्थर उसी क्षण 
खिल उठा
और …
फूल बन गया …
 
11
जितना भी
तुम्हे भूलने की कोशिश की
बेकार गयी …
  
अब लगता है 
तुझे याद करूँ
 
तुझे याद करूँ
ताकि तुझे भुला सकूँ …
 
12
 
युगों से भटकता मन
तुम्हारे द्वार तक 
कैसे पहुंचा पता नहीं
 
बस तुम्हारी मोहब्बत के 
पवित्र जल से
जन्मों की धूल से सना 
अपना चेहरा धोया 
और 
नवजन्म में 
प्रवेश कर गया …..

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1 Response

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