आनन्द गुप्ता की पांच कविताएं

रोता हुआ बच्चा

यह आधी रात का समय है
जब सारे खाए पीए अघाए लोग
अपने दड़बों में चैन की नींद सोए हैं
सड़क के पार एक बच्चा लगातार रोए जा रहा है
रोते हुए बच्चे की भूख
मकानों से बार-बार टकराकर
घायल हो गिर रही है जमीन पर

यह कैसा समय है
कि बच्चे रोते चले जा रहे हैं
फिलीस्तीन से वियतनाम तक
नामीबिया से सीरिया तक
काली हांडी से मराठवाडा़ तक
और वातानुकूलित कमरों के कान बंद हैं
राष्ट्रीय योजनाओं और घोषणा पत्रों से बाहर है
रोते हुए बच्चे
देश के नक्शे पर पडे़ जिन्दा धब्बे

यह कैसा समय है
जब देश के अनाज का एक चौथाई
चील कौवों के नाम कर छोडा़ गया है
रोते हुए भूखे बच्चों का हिस्सा
किसी फाइल में दर्ज नहीं है

बच्चा रोए जा रहा है
गोल-गोल रोटी सा चाँद आकाश में हँसता है
बच्चे के पीछे विज्ञापन में मुस्कुराता एक चेहरा
सबको मुँह चिढा़ता
देश की यश गाथा गा रहा है
और बच्चा है कि रोए जा रहा है।

प्रेम में पडी़ लड़की

वह सारी रात आकाश बुहारती रही
उसका दुपट्टा तारों से भर गया
टेढे़ चाँद को तो उसने
अपने जूडे़ में खोंस लिया
खिलखिलाती हुई वह

रात भर हरसिंगार सी झरी
नदी के पास
वह नदी के साथ बहती रही
इच्छाओं के झरने तले
नहाती रही खूब-खूब

बादलों पर चढ़ कर
वह काट आई आकाश के चक्कर
बारिश की बूंदों को तो सुंदर सपने की तरह
उसने अपनी आँखों में भर लिया
आईने में उसे अपना चेहरा
आज सा सुंदर कभी नहीं लगा
उसके हृदय के सारे बंद पन्ने खुलकर
सेमल के फाहे की तरह उड़ने लगे
रोटियाँ सेंकती हुई
कई बार जले उसके हाथ
उसने आज
आग से लड़ना सीख लिया।

अँधेरे का सुख

अंधेरा हमारे लिए खोलता था
एक नई दुनिया का द्वार
जब पूरे मुहल्ले की बिजली
गुल हो जाती
पूरा घर रोशनी के
कृत्रिम आवरण से बाहर आकर
जुटता था आँगन में
खुले आकाश के नीचे
आँगन के बीच लगी खटिया पर
बैठते दादा और दादी
और फिर शुरू होती थी
एक अनूठी यात्रा
उनके पास
राजाओं और रानियों के
राजकुमारों और राजकुमारियों के
गली मुहल्लों के
असंख्य किस्से थे
चाँद-सितारों के साथ-साथ
अंजाने-रहस्यमयी
पर्वतों, जंगलों, द्वीपों,
सागरों एवं महासागरों की
अनंत कहानियाँ थी।


अँधेरा हमारे लिए वह माध्यम था
जिसमें हम दूसरी दुनिया में
बेरोकटोक आवाजाही कर सकते थे।
कभी-कभी तो कहानियाँ लम्बी हो जाती
और हम बिजली के
न आने की प्रार्थना करते
अक्सर बिजली हमारे कल्पना लोक में
बाधा उत्पन्न करती
और हम जम कर कोसते बिजली वालों को
रोशनी एक खलनायक की तरह
हमारे सपनों की दुनिया में हस्तक्षेप थी।

अँधेरे और रोशनी के बीच की जंग को
देखते हुए बढे हम
हमारी स्मृतियों के
किसी अँधेरे कोने में
बंद होकर रह गई वह दुनिया।

इधर वर्षों से इनवर्टर की सुविधा है
अब मेरे घर की रोशनी
कभी नहीं बुझती।
अभी-अभी बच्चों के चिल्लाहटों से
बिजली के गुल होने का चला है पता
पर हमें फर्क नहीं पड़ता
पत्नी सेंक रही है रोटियाँ
मैं निपटा रहा हूँ जरूरी काम
बेटे को समय पर निपटाना है होमवर्क
पर यह सोचकर
अचानक घबराहट से भर चुका हूँ
यांत्रिक उजाले ने छीन ली है
बेटे के जीवन से

अँधेरे का वह अप्रतिम सुख।

अपने ही अंदर

सबने कहा
वह आकाश सी है
मैं आकाश के पास गया
वहाँ कुछ नहीं था
सिवाय सूनेपन के ।
सबने कहा
वह फूल सी है
मैं फूल के पास गया
और सौन्दर्य के भार से
झरने लगी
उदासी की पंखुरियाँ ।
सबने कहा
वह चाँद सी है
मैं शांत नदी के पास गया
वह आँसुओं से थी तरबतर ।
वह कहीं नहीं थी
न आकाश में
न फूल में
न चाँद में
नहीं गया मैं सिर्फ
अपने ही अंदर ।

देह का रहस्य

देह की गंध में
डूबता है एक और देह
देह की संगीत में
झूमते हैं दो देह एक साथ
जब एक देह में बजता है
दूसरे देह का राग
बाकी सारे राग बेकार हो जाते हैं
धमनियों में बहता खून
अंतरिक्ष के किसी अदृश्य कोने तक
पहुँचने को बेताब होकर
बड़ी तेजी से अंधी दौड़ दौड़ता है।

आकाश के मन पर उमड़ती है
जब प्रेम की बदरी
धरती की देह
सबसे पहले भींगना चाहती है
नदी की देह
अपनी उद्दाम इच्छाओं के साथ
वेगवती होकर
मिलती है समुद्र से
और तेज हुँकार के साथ
समुद्र में विलीन हो जाती है।
देह को जानने की
हर कोशिश
एक अबूझ पहेली सी
अनसुलझी रह जाती है हमेशा।

महासागरों से भी गहरा
और हिमालय की दुर्गम चोटियों सा कठिन है
देह का रहस्य
देह इस धरती का
सबसे रहस्यमयी जंगल है
जिसे अभी खोजा जाना बाकी है।

You may also like...

1 Response

  1. मंजु श्रीवास्तव says:

    आनंद गुप्ता की पांचो कविताएं बहुत ही खूबसूरती से अपने समय का सच बयान करती हैं।

Leave a Reply