आनन्द गुप्ता की तीन कविताएं

शब्द

शब्दों में ही जन्मा हूँ
शब्दों में ही पला
मैं शब्दों में जीता हूँ
शब्द ओढ़ता बिछाता हूँ।
जैसे सभ्यता के भीतर
सरपट दौड़ता है इतिहास
सदियों का सफर तय करते हुए
ये शब्द मेरे लहू में दौड़ रहे हैं
मैं
शब्दों की यात्रा करते हुए
खुद को आज
ऐसे शब्दों के टीले पर
खड़ा महसूस कर रहा हूँ
गोकि
ढ़ेर सारे झूठे और मक्कार शब्दों के बीच
रख दिया गया हूँ
क्या करूंगा उन शब्दों का?
जिससे एक बच्चे को
हँसी तक न दे सकूँ
एक बूढ़ी माँ की आखिरी उम्मीद भी
नहीं बन सकते मेरे शब्द
मेरे शब्द नहीं बन सकते
भूखे की रोटी
एक बेकार युवक का सपना तक नहीं।
क्या करूंगा उन शब्दों का?
जिनसे मौत की इबारतें लिखी जाती है
जिसको झूठे नारों में उछाला जाता है
मेरे शब्दों!
तुम वापस जाओ
जंगलों को पार करो
खेतों में लहलहाओ
किसी चिड़ियाँ की आँखों में बस जाओ
नदियों के साथ बहो
सागर सा लहराओ
जाओ!
कि तुम्हे लंबी दूरी तय करनी है
बनना है अभी थोड़ा सभ्य।

नींद में नदी

इस वक्त नदी गहरी नींद में है
उसे तय करनी है लंबी यात्राएँ
मछलियाँ
दे रही है थपकी
थकी नदी को
मछलियाँ उनींदी है
ताकि नदी की नींद न उड़ जाए
टूट न जाए नदी के सपने।

अंधेरे वक्त में

अंधेरे से
तुम मत घबराना

मेरे बच्चे!
रखना विश्वास अपने मन के सूरज पर
क्या हुआ जो दूर है तुम्हारी सुबह
अंधेरे में भी तुम खोज लेना अपनी राह
याद रखना बाँध कर गाँठ
घने अंधेरे में ही फूटते है बीज
पहली बार
पौधे लेते है साँस।
सबसे अंधेरे समय में ही
लिखी जाती है
सबसे अच्छी कविताएँ
अंधेरे के रथ पर सवार होकर ही
आती है ख्वाबों की बारात।

मेरे बच्चे!
इस अंधेरे वक्त में
नहीं कुछ मेरे पास
तुम्हें उत्तराधिकार में देने को
सिवाय थोड़े आग के
इसे अपने सीने में संभाल कर रखना
हर क्षण ठंडी पड़ती धरती को
एकदम ठंडा होने से बचाने के लिए
बुझने मत देना ये आग
देना अपने बच्चो को
इसे उपहार की तरह।

मेरे बच्चे!
इस अंधेरे वक्त में
गर न बन सको मशाल
कभी मत छोड़ना आस
लड़ना अंधेरे के खिलाफ
चमकना जुगनूओं की तरह।

2 comments

Leave a Reply