अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक

कोई  तस्वीर  धुंधली  सी  ख़यालों में उभरती है

मगर वो मजहबी झगड़ों में कुछ कहने से डरती है

नए लफ़्ज़ों  के  लहंगे में सियासत जब उतरती  है

सहम जाती है हर ख़्वाहिश शराफ़त घुटके मरती है

किसी के  इश्क़ में  अपनी कोई  चाहत नहीं होती

मुहब्बत  हुक़्म  देती  है  वफ़ा तामील  करती  है

अभी  उन्मुक्त लहरों  से हवा  तुम  दूर ही रहना

अँधेरों  में  कोई  कश्ती  समुंदर  से  गुज़रती है

कहाँ  मायूस  होते  हैं  चमन  में फूल  के चेहरे

हवा का  जब कलेजा  चीरकर  खुशबू बिखरती है

दो

अनमोल  ये  गुहर है  इसे  आज़माइए

माथे पे अपने  देश  की मिट्टी  लगाइए

कुछ हुस्न भी पड़े है मुहब्बत के सफर में

काँटे  हैं जितने  राह में उनको  हटाइए

जीवन में फैल जाएगी हर सिम्त रोशनी

दिल में कोई उम्मीद का दीपक जलाइए

ये आँधियाँ न तुझको हिला पाएँगी कभी

थोड़ा सा  अपने  पाँव  ज़मीं से अड़ाइए

आवाज़  से  लबों  की  रहेंगी न  दूरियाँ

होठों  पे  एतबार   का  जज़्बा  सजाइए

तीन

स्वार्थ में डूबा रहा परमार्थ  को तत्पर न था

मौन के अतिरिक्त मेरे पास भी उत्तर न था

सिर्फ अपने ध्यान में  ही लोग सारे चल पड़े

भावनाएँ थीं महज़ आक्रोश का लश्कर न था

अधमरा स्तब्ध सा  है गाँव  का  चौपाल भी

मन के सम्बन्धों का ऐसा सर्द ये मंज़र न था

आधुनिकताओं  ने  ली  कैसी  यहाँ अंगराइयाँ

ध्वस्त होकर गिर पड़े सब शेष कोई घर न था

किस तरह  कानून  को अनुकूल  ठहराता वहाँ

बेबसी  तो थी  वहाँ  इंसाफ़ का दफ़्तर न था

चार

दस्तकें   देती  है  रातों  में हवा  ये  भी हुआ

ख्वाब  आँखों में  नहीं  आने  दिया ये भी हुआ

जिस्म  के इस  शहर  की  रंगीनियों  के सामने

गाँव  ही  मुझको बहुत  अच्छा लगा ये भी हुआ

बेखुदी में  घर  से आया  दोस्तों   की  भीड़  में

जाने क्यों ख़ुद से ही फिर मिलना पड़ा ये भी हुआ

दुख  बताने के  लिए  जब  सामने   कोई न था

अपने  सारे  आंसुओं  को पी   लिया  ये भी हुआ

उँगलियाँ खामोशियों  में   जब कभी  चटखीं बहुत

सब्र को  होना  पड़ा  उस दिन  जुदा  ये भी हुआ

पांच

दर्द  की  धूप को  शिद्दत  से सजाया जाए

मैं  चलूँ और  मेरे  साथ  में  साया  जाए

जिसने  हर बार  मुहब्बत का किया है सौदा

उसको  रिश्तों की  अदालत में बुलाया जाए

गुम  न  जाएँ   अँधेरों  में  कहीं  घर  सारे

शाम  होते  ही  चिरागों  को   जलाया जाए

बिजलियाँ तोड़ दिया करती हैं शाख़ों की लचक

ऐसे मौसम  में खुले  सर को  बचाया   जाए

जो कि  हालात  के  वारों  से डरे  सहमे   हैं

कैसे  लड़ते  हैं  उन्हें  चलके  बताया   जाए

—-

परिचय
अनिरुद्ध सिन्हा
जन्म तिथि    –    02.05.1957
शिक्षा        –    एम.ए. (अर्थशास्त्र)
पाॅंच ग़ज़ल संग्रह, पाॅंच आलोचना (ग़ज़ल) की पुस्तकें, एक कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह प्रकाशित
सम्पादन    –    बिहार के प्रतिनिधि ग़ज़लकार, समय सुरभि अनंत, जनपथ का ग़ज़ल
विशेषांक का सम्पादन
किसी किसी पे तो ग़ज़ल मेहरबान होती है- अशोक मिजाज की ग़ज़लों का सम्पादन
सम्मान        –     बिहार उर्दू अकादमी, बिहार राजभाषा, विद्या वाचस्पति के अतिरिक्त दर्जनों
साहित्यिक  संस्थाओं द्वारा सम्मानित
प्रकाशन    –    हंस, पाखी, समकालीन भारतीय साहित्य, गगनांचल, आजकल, वागर्थ,
अक्षरपर्व, इन्द्रप्रस्थ भारती, साहित्य अमृत के अतिरिक्त देश के तमाम स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
सम्प्रति        –    स्वतंत्र लेखन

सदस्य –बिहार राज्य फिल्म विकास एवं वित्त निगम

सम्पर्क        –    गुलजार  पोखर, मुंगेर (बिहार) 811201
मोबाइल    –    09430450098
ई-मेल        –   anirudhsinhamunger@gmail.com

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