अनिरुद्ध सिन्हा की चार ग़ज़लें

एक

जाँ बदन से जुदा  है रहने दे

ये जो मुझसे खफ़ा है रहने दे

एक न एक रोज़ हादसा है यहाँ

अब वहाँ क्या हुआ है रहने  दे

छोड़ अब  हुस्न-इश्क़  की बातें

ये  फसाना  सुना  है  रहने दे

अपनी सूरत से मत डरा मुझको

सामने  आईना   है  रहने  दे

छेड़खानी  न  कर  वफ़ाओं से

वो अगर  बेवफ़ा  है  रहने दे

दो

चाक दामन जब  हुआ उसको रफू करते रहे

ज़िंदगी भर  ज़िंदगी  की  आरज़ू  करते रहे

कुछ तसल्ली और खुद की मुस्कुराहट के लिए

दर्द  मेरा  हर  घड़ी  तुम  सुर्खुरू करते  रहे

देखने  लायक   हमारी  थी  वहाँ  दीवानगी

अपनी आँखें बंद  कर  हम गुफ़्तगू करते रहे

था नहीं चेहरा किसी का  और इसके बावजूद

रात भर हम जाने किसकी जुस्तजू करते रहे

घर- गृहस्थी रिश्ते-नाते और ये अपनी ग़ज़ल

इनके पीछे उम्र  भर दिल  को लहू करते रहे

तीन

दुआ के बदले में  लोगों की बद दुआ लेकर

निकल पड़े  हैं सफ़र में न जाने क्या लेकर

सवाल  ये  है कि मिलने  के बाद भी देखो

सिसक रहे हैं  वो यादों का सिलसिला लेकर

किसी भी घर में  मुहब्बत  हमें नहीं मिलती

भटक  रहे  हैं  अदावत  का  फासला लेकर

वफ़ा  खुसूस  मुहब्बत  ये खो  गए हैं कहाँ

तलाश  आज  भी करते हैं  हम दिया लेकर

कि जिसका चेहरा मुकम्मल न हो सका अबतक

मेरी  तलाश  में  निकला  है  आईना  लेकर

चार

काम इतना तो दिल ये कर जाए

बन के खुशबू कहीं  बिखर  जाए

खुद को इतना उछाल कर रखिए

मौत भी  ज़िंदगी से  डर  जाए

मुस्कुराकर ही तुम  गले मिलना

आँख जब आँसुओं से भर  जाए

ये वतन हमको  इतना प्यारा है

हम  न  छोड़ेंगे चाहे  सर जाए

गुफ़्तगू  हम  वहाँ  से करते  हैं

वक़्त  आकर  जहाँ  ठहर  जाए

 

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गुलज़ार पोखर,मुंगेर (बिहार)811201

Email-anirudhsinhamunger@gmail.com

Mobile-09430450098

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