अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक

राह की  दुश्वारियों  के रुख  बदलकर देखते

जिस्म घायल ही सही कुछ दूर चलकर देखते

 

नींद में ही मोम बनकर ख़्वाब से की गुफ्तगू

दोपहर की  धूप में  थोड़ा  पिघलकर  देखते

 

कुछ तजुर्बों के  लिए  ही दोस्तो इस दौर में

देश की मिट्टी कभी  माथे पे मलकर  देखते

 

बेबसी की  बाजुओं में  जाने  कब से क़ैद है

चंद लम्हों के  लिए  बाहर निकलकर देखते

 

उम्र भर जलते रहे  जो  रंजिशों की आग में

वो मुहब्बत के चिरागों  में भी जलकर देखते

 

दो

दरो – दीवार  के  परदे  उठा  दो

कहीं कुछ भी नहीं बदला दिखा दो

 

दरख्तों की ये शाखें जल रही  हैं

ज़मीं का दर्द मौसम को बता दो

 

मेरी बस्ती में आने के क़बल तुम

सुनहरे  फूल  का जेवर  हटा दो

 

परिंदे  भी  हवा  को  ढूंढते  हैं

शजर खामोश  है शाखें हिला दो

 

समझने के लिए तक़दीर क्या है

लकीरें हाथ की अपनी मिटा  दो

 

तीन

इन चिरागों ने क्या लिया मुझसे

डर हवाओं को जो  हुआ  मुझसे

 

हर घड़ी  ग़म तेरा  मिला मुझसे

कब हुआ  तू  कभी  जुदा मुझसे

 

क्या कोई ख़्वाब तुझमें  ज़िंदा है

आँख अपनी  मिला जरा  मुझसे

 

उनके  सजदे में  सर झुकाता हूँ

जिनका  रहता है वास्ता  मुझसे

 

ख़ुद के होने का क्या गुमा रखता

अपना साया  भी है  खफ़ा मुझसे

 

चार

निकल न पाया कभी उसके दिल से डर मेरा

इसीलिए  तो  जलाया  है  उसने  घर मेरा

 

तमाम  रात  जो  तुम  बेखुदी  में रहते हो

तुम्हारे  दिल पे है  शायद अभी असर मेरा

 

मैं उस गली  में अकेला  था इसलिए शायद

हवाएँ  करती  रहीं  रात  भर  सफर  मेरा

 

न जाने  कौन  सी  उम्मीद  के  सहारे पर

ग़मों के  बीच  भी हँसता  रहा  जिगर मेरा

 

नई   सुबह  के   नए  इंतज़ार  से  पहले

खुला  हुआ  था   तेरी  याद  में  ये  दर

 

पांच

इतने आँसू  मिले  ज़िन्दगी से

और क्या चाहिए अब किसी से

 

खुद नशेमान से बाहर हुए हम

अपने  लोगों  की  बेचारगी से

 

रात गुज़री  महज़ करवटों  में

ज़ख्म मिलता  रहा रौशनी से

 

टूटे हैं कुछ हसीं दिल जहां में

दुश्मनी  से  नहीं  दोस्ती  से

 

जिस सलीके से सबसे है मिलता

लूट  लेगा  कभी  सादगी से

 

 

———————–गुलज़ार पोखर,मुंगेर(बिहार)811201

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Mobile-09430450098

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