अनुपम निशान्त के तीन गीत

अनुपम निशान्त

1. तुम प्रेम का दीप जला देना

जब जीवन की साँझ ढलेगी, दिन धुंधले पड़ जाएंगे
तब दरवाजे की चौखट पर तुम प्रेम का दीप जला देना।

अभी तो सबका संग-साथ है, हर दिन कोई नई बात है,
ऋतुएं मद्धम राग सुनाती हैं, अभी प्रकृति में उल्लास है,
तब भी सब ऐसा ही होगा बस स्वर उदास हो जाएंगे,
तब दरवाजे की चौखट पर तुम प्रेम का दीप जला देना।।

अभी तो आंखों में विश्वास है, सपने सच होने की आस है,
सुबह उम्मीदों से अभी भरी है, दूर क्षितिज,  लगता पास है,
तब ऐसा न होगा प्रियतम, कलम कांपेगी, शब्द भी थरथराएंगे,
तब दरवाजे की चौखट पर तुम प्रेम का दीप जला देना।।

2- मैं गीत प्रेम के लिखता हूँ

मैं गीत प्रेम के लिखता हूँ, तुम भाव सुकोमल भर देना।
जिन शब्दों में सूनापन झलके, उनका रंग वसंती कर देना।।
मैं गीत प्रेम के लिखता हूँ.....

मुझे याद हैं वे दिन अपने जब धूमिल-धूसर पड़े थे सपने,
ऐसे में निश्छल-स्नेहिल मुस्कान लिए तुम आईं मेरे जीवन में
जैसे उल्लास भरा पावन उजियारा मुझमें तुमने रच डाला,
वैसे ही मेरे नीरस शब्दों में तुम सुर सरगम के भर देना।
जिन शब्दों में सूनापन झलके, उनका रंग वसंती कर देना।।
मैं गीत प्रेम के लिखता हूँ....

जब दुःख में विचलित होता हूँ तब संबल बनता प्रेम तुम्हारा,
मेरे शब्दों के पुष्पित लतरों का अवलंबन बनता प्रेम तुम्हारा
जैसे मेरा हाथ थामकर तुमने मुझे उठाया-मुझे संवारा,
वैसे ही मेरे शब्दों में प्रियतम अधरों की मुस्कान जरा-सी धर देना।
जिन शब्दों में सूनापन झलके, उनका रंग वसंती कर देना।।
मैं गीत प्रेम के लिखता हूँ, तुम भाव सुकोमल भर देना।।

 

3. मौसम और प्रेम

क्या तुम आओगी मुझसे मिलने...?
जब बारिश होगी, जब फूल खिलेंगे
जब काले बादल छाएंगे, गरजेंगे, बरसेंगे
तब...क्या तुम आओगी मुझसे मिलने..??

जब सूखे-ठूंठ पहाड़ों पर हरियाली छा जाएगी,
जब दूर कहीं पेड़ पर बैठी कोयल गीत सुनाएगी,
जब जंगल में गूंज उठेगा कल-कल बहते झरनों का शोर,
जब तपती धरती को तृप्ति मिलेगी, बूंदों संग नाचेंगे मोर,
तब...क्या तुम आओगी मुझसे मिलने..??

जब खेतों में भीगी औरतें धान रोपतीं गीत मिलन के गाएंगी,
जब काठ हो चुके पेड़ हरियाएंगे और उन पर चिड़िया इठलाएंगी,
जब साँझ ढले धुंआ चूल्हे का गांव को अपने आगोश में लेगा,
जब पगडंडियों पर बिछलेंगे पांव और मिट्टी का सोंधापन महकेगा,
तब...क्या तुम आओगी मुझसे मिलने..??

देखो, बादल इस मौसम में नहीं भूलते कैसे धरती पर छा जाते हैं,
देखो, किनारे इस मौसम में नहीं भूलते कैसे लहरों में समा जाते हैं,
देखो, खग-विहग इस मौसम में नहीं भूलते कैसे गीत प्रेम के गाते हैं,
देखो, राग भी इस मौसम में नहीं भूलते कैसे रागिनियों से मिल जाते हैं

तो उम्मीद करता हूँ मैं एकाकी, तुम भी ना भूलोगी अबकी
प्रकृति की तरह सजोगी-संवरोगी और मुझसे मिलने आओगी इस मौसम में..

इस भीगे-भीगे मौसम में...।

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