अनुपमा तिवाड़ी की 2 कविताएं

अनुपमा तिवाड़ी

ए – 108, रामनगरिया जे डी ए स्कीम, 

एस के आई टी कॉलेज के पास, जगतपुरा, जयपुर 302017 

  1. मुझे बहुत कुछ हो जाना है

मुझे पेड़ों से प्यार करते हुए,
एक दिन पेड़ हो जाना है
मुझे नदी से प्यार करते हुए,
एक दिन नदी हो जाना है
मुझे चिड़िया से प्यार करते हुए,
एक दिन चिड़िया हो जाना है
और मनुष्य से प्यार करते हुए
एक दिन और मनुष्य हो जाना है
मुझे इस जीवन में अभी बहुत कुछ हो जाना है

 

2. बेशर्म वक्त

जब नवरात्रों में एक ओर बालिकाएं पूजी जा रहीं हों

और दूसरी तरफ नन्हीं बालिकाओं की देह दुष्कर्म का शिकार हो रहीं हों

उस वक्त सिर्फ बेशरम हो कर जीया जा सकता है…

जब पैदल चलकर देश भर से लोग गंगाजल ला कर अपने घर को पवित्र कर रहे हों

और पवित्र होने गई एक औरत को खीचा जा रहा हो

उस वक्त सिर्फ बेशरम हो कर जीया जा सकता है…

जब चार परांठे तुम अपने बैग में रखकर यात्रा पर निकले हो

और तुम्हारे पास से दीन – हीन सूखी हथेली खाली चली जा रही हो

उस वक्त सिर्फ बेशरम हो कर जीया जा सकता है… 

जब तुम्हारे घर में इस्तेमाल करने के लिए पांच बाथरूम हों

और कच्ची बस्ती या गाँव के हैण्डपम्प पर कुछ औरतें झुण्ड में लूगडी से आड़ बनाकर लाज बचाने की जुगत में लगी हों

उस वक्त सिर्फ बेशरम हो कर सकता है…

जब तुम पक्के घर की छत के नीचे गद्दे पर नरम रजाई में दुबके हो

और कड़कती ठण्ड में कोई फ्लाई ओवर के नीचे फुटपाथ पर खुले आसमान में सिर अपने पेट में छुपाए दुहरा हुआ जा रहा हो

उस वक्त सिर्फ बेशरम हो कर जीया जा सकता है…

जब तुम होटल में खाने को मुँह माँगी चीजें ऑर्डर दे कर खाओ

और दुनिया भर में तीन में से एक आदमी भूखा सोता हो

उस वक्त सिर्फ बेशरम हो कर जीया जा सकता है…

 

जब कभी तुम फ्लाइट पकड़ने गाड़ी से जा रहे हों और पास में ही कोई

भरी धूप में लोडिंग रिक्शे को गले में टायर डालकर खींचता रिक्शा चालक चल रहा हो

उस वक्त सिर्फ बेशरम हो कर जीया जा सकता है…

जब कभी तुम बड़ी गाड़ी की सीट में धंसे

किसी आदमी या कुत्ते को टक्कर मार कर आगे बढ़ गए हों और वो नहीं बचा हो

उस वक्त सिर्फ बेशरम हो कर जीया जा सकता है…

जब तुम शानोशौकत से भरी शादियों में खाना छोड़ रहे हो

और फुटपाथ पर रहने वाले गरीब बच्चे उसमें से खाना चुन रहे हों

उस वक्त सिर्फ बेशरम हो कर जीया जा सकता है…

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