अनुराग अन्वेषी की ‘भरोसे’ की 10 कविताएं

अनुराग अन्वेषी

ए-802, जनसत्ता सोसाइटी, सेक्टर 9,

वसुंधरा, गाजियाबाद 201012 (उत्तर प्रदेश)

मोबाइल 9999572266

भरोसा-1

घात-प्रतिघात के

एक से बढ़कर एक तूफान देखे हैं मैंने

पर हर बार थोड़ा सा हिलता-डुलता

और फिर संभलता हुआ

टिका रह गया हूं

पूरी मजबूती के साथ

शायद इसकी एक बड़ी वजह

वह भरोसा है

जो अक्सर ऐसे तूफानों के बीच भी

दबे पांव ही सही

पर बिलकुल सधे कदमों के साथ

मेरे करीब आ जाता है

और हौले से मुझमें समा जाता है।

 

भरोसा-2

जो कहते हैं

कि खुद के अलावा

किसी और पर नहीं कर सकते भरोसा

दरअसल, वह खुद की निगाह में

भरोसे के लायक नहीं होते।

भरोसा-3

यह पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं

कि आशंकाएं जहां खत्म होती हैं

वहीं से शुरू होती है

भरोसे की दुनिया

 

भरोसा-4

जो मानते हैं

कि दूसरों पर भरोसा जताना

खुद पर से भरोसे का उठ जाना होता है

या फिर अपने भरोसे की मजबूती को और बढ़ाने का

एक शातिराना चाल होता है

ठीक से टटोलें उनकी जिंदगी

वहां उपलब्धि कम, ज्यादा मलाल होता है

 

भरोसा-5

खुद पर भरोसा करना

अपने आप में ताकत पैदा करना होता है

जो आपको किसी भी बंद दरवाजे से टकराने की हिम्मत देता है

पर जब आप

दूसरों का भी भरोसा

साथ लेकर चलने लगते हैं

तो बंद दरवाजों से टकराने की जरूरत ही नहीं पड़ती

वे आपको पहले से ही खुले मिलते हैं

बाहें पसार कर स्वागत करते हुए।

भरोसा-6

जो सिर्फ इस नाते खुद पर करते हैं भरोसा

कि पछाड़ देना है दूसरों को

वे कभी नहीं हो पाते

दूसरों के भरोसे के काबिल।

भरोसा-7

आप कितनों पर करते हैं भरोसा

इससे ज्यादा ध्यान देने की बात यह है

कि कितने लोग आप पर करते हैं भरोसा।

 

भरोसा-8

अपने आसपास कई बार टूटते देखा है

एक-दूसरे का भरोसा

और हर बार यही महसूस किया

कि टूटा सिर्फ भरोसा नहीं, लोग भी टूटे।

 

भरोसा-9

जिस वक्त आप किसी एक पर

जताते हैं खूब भरोसा

उसी वक्त कई-कई लोग एक साथ

आपकी निगाह में

थोड़े संदिग्ध दिखने लग जाते हैं।

पर क्या आपको पता है

कि ये संदिग्ध आपका कुछ बिगाड़ पाएंगे ही – इसमें बड़ा संदेह है।

पर जो होते हैं सबसे भरोसेमंद

वह पूरे यकीन के साथ,

जब चाहें जैसे चाहें,

आपकी बखिया उधेड़ सकते हैं।

जो आपकी निगाह में संदिग्ध हैं,

कम से कम उनकी निगाह में तो

आपको हमेशा के लिए

पल भर में संदिग्ध बना सकते हैं।

 

भरोसा-10

बहुत जल्द टूटता है भरोसा।
आशंकाएं
बहुत दूर तक पीछा करती हैं।
और जो शक ने कर ली घुसपैठ
तो फिर
जीवन नर्क होता है।

क्यों नहीं बनता भरोसा
दोबारा उतनी तेजी से
जितनी जल्दबाजी में वह टूटा?

आशंकाएं क्यों नहीं सिमटतीं
उतनी ही तेजी से
जितनी तेज पसरती गई थीं?

और
शक क्यों नहीं मरता
हमारे भीतर से
हमारी जिंदगी रहते?

दरअसल,
दोष हमारा ही है
कभी-कभी आंखें मूंद कर
हम कर लेते हैं भरोसा।
और इसी तर्ज पर कभी-कभी
सचाई से आंखें मूंद
छोड़ देते हैं किसी का भरोसा।

जब-जब छोड़ते हैं हम भरोसा
कोई न कोई आशंका हमें घेरती है।
हर गतिविधि संदिग्ध लगती है।
और हर बात में
साजिश की बू तलाशने लगते हैं हम।

और ऐसी ही मन:स्थितियों में
शक
बड़ी आसानी से करता है घुसपैठ
धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे
आपके भीतर के
संजिदा इंसान को मारता रहता है
आप घुटन और आक्रोश की देह बन जाते हो।

पर एक बात और याद रखो
शक कभी
किसी एक इंसान को नहीं मारता,
वह अक्सर करता है
दोहरी हत्या।
यानी एक तो
वह संजीदगी मारी जाती है
जिसे भ्रम हुआ था
कि किसी ने तोड़ा भरोसा।
और दूसरा
वह मारा जाता है
जिसके बारे में भ्रम पसरा
कि उसी ने तोड़ा भरोसा।

 
 
 
 
 

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