अनुरंजन शर्मा की 3 कविताएं

अनुरंजन शर्मा

ए – 108, रामनगरिया जे. डी. ए स्कीम 

एस. के. आई . टी कॉलेज के पास, जगतपुरा 

जयपुर 302017 

फोन 9680542664, 7742191212 

mail : anuranjan.sharma25

@gmail.com

  1. कहानी

कहानियों की दुनिया हो सकती है शायद

इस दुनिया से भी बड़ी

जैसे तारों की खीर गंगा

आसमान में है खड़ी

सूरज की किरणें हर रोज़ यहाँ से कोसों दूर

छूटती हैं सूरज के बाण से

और लगती हैं, बदन पर

धधकते हुए तीर की तरह.

बस उस ही तरह कोसों दूर से आती हैं कहानियाँ

और देती हैं हमें नई उम्मीदें

एक नया सृजन.

ऐसा होना देखने से लगता है

कि कहानियाँ कोई नहीं लिखता होगा,

कहानियाँ हमें लिखती होंगी.

अब इस कहानी के तीर को बदन में लिए

घूमते हैं हम सारे शहर में

और फिर एक के बाद एक बहुत से तीर

गालियों से निकलकर लगते जाते हैं हमें, इन कहानियों के तीर

जितना धंसते जाते हैं बदन में

उतना ही हम मृत्यु नहीं,

जीवन की ओर बढ़ते जाते हैं.

 

  1. अब्बा – अम्मी

अब्बा – अम्मी साथ चले,

आँखें फटी हुईं,

नाक उठी,

कान खड़े हुए,

जमीन भूरी, कहीं काली

और रेत का टीला भरा हुआ

फिर भी खाली – सा है.

सूरज भी छिप रहा है कहकर

आज इतना ही लाया था, अब जा रहा हूँ

टीले से दूर संगीत पर नाचती रंगीन रौशनियाँ

चिढ़ा रही हैं उन्हें

जिनके रंग, रेत में बेर बीनते हुए फीके हो गए हैं.

अब्बा अचानक रुके टीले पर, इशारा किया

अम्मी दौड़कर पास आईं

हाथ भिड़े, मुड़े

पकड़ा एकदूजे को

दोनों ने गहरी साँस ली

जैसे आखिरी बार ले रहे हों और हवा को महसूस करने लगे,

फिर दबे पाँव हवा में तैरती आई

पहली खुशबू,

अब्बा और अम्मी ने

दूर बनते पकवानों की खुशबू को भाँप लिया था

उत्तेजना और बढ़ी

फिर आया सैलाब खुशबुओं का

और अब्बा ने होशियारी दिखा

लड्डू, भुजिए और पूड़ियों की गंध

बेटी फ़ईज़ा के लिए रख ली

अम्मी के हिस्से आई

आलू, प्याज़ और धनिये की गंध

इन सभी खुशबुओं का गुब्बारा बना

दोनों चले घर को

फ़ईज़ा ने गुब्बारा हाथ में लिया

थोड़ा खेली,

फिर ख़ुशी से उसे फोड़ दिया.

खुशबू के अहसास से

पकवानों की याद से

उसे पेट भरा हुआ – सा लगा

और वो सो गई, अम्मी – अब्बा के पास.

फ़ईज़ा को देने के लिए

और कुछ भी न था.

अब्बा रो पड़े,

अम्मी ने उन्हें चुप कराया

फिर दोनों सिसकियाँ लिए

पकवानों की बची – खुची खुशबू में

खोये से रहे……..

 

 

 

  1. अच्छे दिनों की याद

हम अच्छे दिनों को याद करेंगे

हम मुस्कुराहटों को याद करेंगे

जब यादें पेड़ की सबसे ऊँची डाल तक पहुँच जाएँगी

तब उस डाल से और यादों की जगह बनाएँगे.

फिर कुछ ही समय में तुम्हारे और मेरे पास होगा

यादों का एक जंगल जो मुझे

पहाड़, नदियों और पेड़ों में सुरक्षित रखेगा.

हम पिघलाएंगे उन यादों को में

जो कभी शीत लहर – सी जमी थीं नदी में

अब तुम्हारे दिए हुए जंगल में

द्वंद्व है दो यादों का.

मैं छुप जाऊंगा चट्टानों में

जब बिजली मुझे मारने आएगी

मैं सो जाऊंगा छाँव में

जब धुप मुझे जलाएगी.

मैं हरा दूंगा, कोहरे से भरी

उन सभी शामों को.

ये द्वंद्व तो हमेशा चलता रहेगा

पर हम याद रखेंगे बस,

उन अच्छे दिनों की यादों को.   

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