अनवर सुहैल की 4 कविताएं

अनवर सुहैल

ये कविताएं अनवर सुहैल के कविता संग्रह डरे हुए शब्द से ली गई हैैं। संग्रह किंंडल पर उपलब्ध है। डाउनलोड करने के लिए नीचे क्लिक करें


  1. कितना ज़हर है भरा हुआ

समय का ये खंड भोगना ज़रूरी था
वरना हम जान नहीं पाते
कि हमारे दिलों में एक-दूजे के खिलाफ
भरा हुआ है कितना ज़हर
नफरतों के इस दौर से उबरकर
जल्द हम प्यार के दीये जलाएंगे
बेशक एक दिन ज़रूर
खाच्चियाँ भर-भर के प्यार बरसाएंगे

2. जड़ें सलामत हैं

एक कवि के नाते
मुझे विश्वास है
कि जड़ें हर हाल में सलामत हैं
मुझे इस बात पर भी
यकीन है कि हमारी जड़ें
बहुत गहरी हैं जो कहीं से भी
खोज लाती रहेंगी जीवन-सुधा

तुम्हें लगता हो या नहीं
लेकिन इधर जाने क्यों
ऐसा महसूस होने लगा है
कि कुछ लोग
हमें जड़ सहित उखाड़कर
हमारी जड़ों में मट्ठा डालने की
रच रहे हैं साजिशें

मैं तुम्हीं से कर सकता हूँ साझा
अपनी ये चिंताएं दोस्त
और आगाह भी करना चाहता हूँ
कि वे लोग उन्हें भी तलाश रहे हैं
जो मेरे साथ हैं
जो मेरे आसपास है

3. अबके ऐसी हवा चली है

तुम साथ हो
अच्छा लगता है
मुझे उम्मीद है
हमारा साथ बना रहेगा यूं ही
आजकल डरने लगा हूं जाने क्यों
महसूस होता है जैसे
कोई बलजबरी हटा रहा हो तुम्हें

ऐसा पहले कभी नहीं लगता था
अबके ऐसी हवा चली है
खुद पे भी विश्वास नहीं है
फिर भी तेरे इश्क का दामन
मुस्तैदी से पकड़ के बैठा
दुर्दिन में परछाईं को भी
खुद से अलग न होने दूंगा

4. खुद से ही कत्ल हो जाओ

खुद से ही
क़त्ल हो जाओ
कि बाद तुम्हारे
थरथराते बचे लोग
कह सकें कि स्वेच्छा से
लाशों में तब्दील हुआ था वो।

यह नया निज़ाम है दोस्तों
जब लाशें क़ातिलों की शिनाख्त नहीं करतीं
और जीवित बचे लोग
बहुत दिनों तक
साबुत बचे रहने के लिये
हो जाते खामोश
जीवित लोगों को मालूम है
कि लाशों में बदलने की प्रक्रिया
बहुत तकलीफदेह होती है।

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