अनवर सुहैल की तीन कविताएं

एक
नफरतों से पैदा नहीं होगा इंक़लाब

लेना-देना नहीं कुछ
नफ़रत का किसी इंक़लाब से
नफ़रत की कोख से कोई इंक़लाब
होगा नहीं पैदा मेरे दोस्त
ताने, व्यंग्य, लानतें और गालियाँ
पत्थर, खंज़र, गोला-बारूद या कत्लो-गारत
यही तो हैं फसलें नफ़रत की खेती की…
तुम सोचते हो कि नफ़रत के कारोबार से
जो भीड़ इकट्ठी हो रही है
इससे होगी कभी प्रेम की वर्षा ?
बार-बार लुटकर भी खुश रह सके
ये ताक़त रहती है प्रेम के हिस्से में
नफ़रत तो तोडती है दिल
लूटती है अमन-चैन अवाम का…
प्रेम, जिसकी दरकार सभी को है
इस प्रेम-विरोधी समय में
इस अमन-विरोधी समय में
इस अपमानजनक समय में
नफ़रत की बातें करके
जनांदोलन खड़ा करने का
दिवा-स्वप्न देखने वालों को
सिर्फ आगाह ही कर सकता है कवि
कि कविता जोड़ती है दिलों को
और नफ़रत तोड़ती है रिश्तों के अनुबंध
नफ़रत से भड़कती है बदले की आग
इस आग में सब कुछ जल जाना है फिर
प्रेम और अमन के पंछी उड़ नहीं पायेंगे
नफ़रत की लपटों और धुंए में कभी भी
ये हमारा रास्ता हो नहीं सकता
मुद्दतों की पीड़ा सहने की विरासत
अपमान, तिरस्कार और मृत्यु की विरासत
हमारी ताकत बन सकती है दोस्त
इस ताक़त के बल पर
हम बदल देंगे दृश्य एक दिन
ज़रूर एक दिन, देखना…

दो
ऐसे में कैसे निभाएं लोकाचार

आहट से फर्क नहीं पड़ता
इंतज़ार की हो चुकी इन्तहा
कोई कभी नहीं आता
कोई उम्मीद द्वार नहीं थपथपाती
कोई आवाज़ पलट कर नहीं आती
मुद्दतों से सुनी भी नहीं गई
अपने नाम की पुकार
जैसे बिसरा देता इंसान
दुःख भरे दिनों को
भुला दिया गया हूँ मैं
ड्राइंग रूम के कोने में रखे
फोन की घण्टियाँ भी बजती नहीं
आने को आता है नल में पानी
अखबार, दूध, धोबी, नौकरानी
कभी-कभी कोई चन्दा मांगने वाला
हाँ, सड़क से लांघ कर आ जाती हैं आवाज़ें
पड़ोस के बच्चों की चिल्लाहटें
और कभी तो डराती है
दीवार घड़ी की टिक-टिक
जैसे कोई हथौड़ी से कर रहा हो प्रहार
ऐसे में कोई कैसे निभाये लोकाचार

तीन
प्रेम में डूबे लोग

तब पैठे है प्यार खूब
जब वर्तमान के अलावा कुछ न हो पास
अतीत की यातनाएं न हों याद
भविष्य की चिंताएं न हों साथ
तब होता है प्यार खूब
जब कोई न हो दूजा
इतना अपना लगे जैसे हो अपना चेहरा
अपना मन, अपनी ख्वाहिशें
इतना अपना लगने लगे कोई
कि खुद को भुलाकर दूजे का हो श्रृंगार
जैसे खुद को रहे हों संवार
तब होगा प्यार खूब
जब सौंपने के पीछे नहीं पालन करनी होंगी
नियम और शर्तों की अनिवार्यताएं
सौंपना खुद को इस तरह
जैसे दे रहे हों खुद को ही सब-कुछ
कि इसके बाद भले से हो जाए
खाली हो जाने का खतरा
और प्रेमी ही जान पाते हैं कि
इसे ही प्यार से भरपूर होना कहते हैं…
देखो तो…छत नहीं है सर पे
देखो तो…कपड़े भी नहीं हैं पूरे
देखो तो…भूखे हैं वे कई दिनों से
देखो तो…तब भी प्रेम कर रहा इंसान
इस तरह का प्रेम जिसमें उपहार की होती नहीं लालसा
किसी तरह का प्रलोभन या दाम नहीं होता
वो भी ऐसे समय में हो रहा इस तरह का प्रेम
जब सरकारें बहस-मुबाहसों में व्यस्त हैं
जब मीडिया एक नए सिरे से
गढ़ रहा है देश-प्रेम की परिभाषाएं
जब थका-हारा इंसान
खोज रहा संविधान में अपने दुखों का समाधान
इस डर के साथ कि कभी भी,
कहीं से भी हो सकता पथराव
जो कर सकता है लहूलुहान…
ये डर ही है जो समय का स्थाई भाव है
लेकिन ये भी सच है दोस्त
कि प्रेम में डूबे लोग
हर तरह के डर से आज़ाद होते हैं…

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