आरती आलोक वर्मा की दो कविताएं

मैं आज की नारी हूं

ढूंढते रहे हर वक्त खामियां दर खामियां
दोष मुझमें था या तुम्हारे नजरिए में

नापसन्द थी तुम्हेें हर वो चीज, व्यक्ति या
परिस्थितियाँ जो मुझे बेहद पसंद थी ।
मेरे किसी फैसले तक आने से पूर्व,
सुना देते अपना निर्णय या फिर
धमकियाँ तलाक की

तुम्हारे कहे हरेक शब्द कोलाहल करते
रहते प्रतिपल मेरे जेहन में ।
उसके शोर उसकी गूँज से उथल-पुथल
मची रहती ।
उफनता रहता ज्वार- भाटा भावनाओं का
बहा ले जाता मुझे अनजाने ,अनचाहे दूर
बहुत दूर, किसी अनिष्ट की आशंका से
भयाक्रान्त हो उठती तुम्हे खोने के डर से
प्रेम जो तुमसे करती थी परन्तु ,तुमने
पहचाना कब मुझे ?कब जाना मेरे प्रेम को ?
मेरे समर्पण को?

परन्तु समय के साथ धीरे -धीरे मेरे कानों ने
तुम्हे सुनना बंद कर दिया ।बेअसर होने लगी
धमकियाँ तुम्हारी तब सुनने लगी मन की
आवाज साफ- साफ, बहुत साफ ।।

लाॅ ऑफ रिवर्स एक्ट की तरह
जितना दबाते तुम मुझे उससे कहीं
ज्यादा उभरने लगी अपने वजूद में मैं।
न्यूटन के गति के तीसरे नियम की तरह
होने लगी बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया
मेरी ओर से भी ।।

मैं सीता नहीं कि बिना प्रतिकार के परित्यक्त हो जाऊं,
ना आहिल्या कि किसी के शाप से पाषाण हो जाऊं या
किसी की पगधूलि से शापमुक्त ,गंगा भी नहीं कि शान्तनु
के सवालों से छोड़ दूं घर- बार अपना

क्यूंकि दे सकती
हूं तेरे प्रत्येक सवालों का जबाब मैं बशर्ते न हों वे बेमतलब ।।

मैं कर सकती हूं नाकेबन्दी रिश्तों  के अतिक्रमण का ,
लांछनों का ,अपने प्रति होने वाली प्रताड़नाओं का
क्यूंकि अपने लक्ष्य में निर्बाध बहना जानती हूं मैं
अपना अस्तित्व पहचानती हूँ मैं ।

ना अबला हूं ना दासी ना बेबस बेचारी हूँ
अपने जीवन की हकदार मैं
अपनी खुशियों की अधिकारी हूँ
हां मैं आज की नारी हूं ,मैं आज की नारी हूँ  ।।
अपनी सूरत
अब चाँद सुहाना लगता नहीं
ना  शाम सुहानी लगती है।
हर  आईने में अपनी सूरत
कितनी बेगानी  लगती  है  ।।

छुट गये पीछे कितने
बीते लम्हों के साये वो
टूट गये कच्चे धागे
रूठे अपने- पराये वो
एक जख्म संग है हरा-भरा
जिसकी तासिर पुरानी लगती है ।।

हर आईने में  अपनी सूरत
कितनी बेगानी लगती है ।।

हैं कदम कदम पर ठोकरें
,छालें -छाले पाँव में
शहर शहर सन्नाटा है
तन्हाई पसरी है गाँव में,
ऐसे आलम में अपनी आहट
भी अन्जानी लगती है।।

हर आईने में अपनी सूरत
कितनी बेगानी लगती है ।।

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