अर्जित पाण्डेय की कविता ‘यादों के दरीचों से’

एक हसीन ख़्वाब
कागज़ की तरह मोड़कर
दिल के कमरे में बने
यादों के दरीचे पर मैंने
रख दिए है
धूमिल न हो जाए वो पन्ना
इसलिए अक्सर उसे अपने
आंसुओ से धोता हूँ
उस  ख़्वाब को सजाने में
वक्त की कितनी सीमाएं लांघी हमने,
ये सोचता हूँ
उस पन्ने पर अपने ख़्वाब मैं
और लिखना चाहता था
पर ज़माने की पैदा की हुई ठण्ड ने
मेरी लेखनी की स्याही को ज़मा डाला
मैं बेबस लाचार अब उस ख़्वाब को
लिख नहीं सकता
पर जब वक्त के झोंको से
वो पन्ना
यादों के दरीचे से हिलता है
तो मैं उस लिखे हुए ख़्वाब को पढ़ लेता हूँ

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अर्जित पाण्डेय
IIT DELHI
पता-sd 17
विंध्याचल हॉस्टल
आई आई टी दिल्ली

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