अर्पण कुमार की दो कविताएं

अर्पण कुमार

भँवर

तुम्हारे गाल पर
भँवर पड़ते हैं
मैं उस भँवर में
डूब जाना चाहता हूँ
तबस्सुम से भरे
तुम्हारे होंठों को
भरपूर पीना चाहता हूँ
तुम हो तो
दुनिया आबाद है मेरी
तुम्हारे पास होने मात्र से
हवा मेरे नाम का संगीत
रचती है
जब मुस्कुराती हो तुम
मुझे देखकर
आकाश में सबसे अधिक
ऊँचाई पर उड़ती पतंग की डोर
सहसा मेरे हाथ में
आ जाती है
काजल-पुते तुम्हारे नयन
क्या कहते हैं मुझसे…
बरसात
यह सुनने के लिए
हमारी खिड़की के बाहर
ठिठक जाती है

तुम्हारी बतकही

अपने होंठों पर
जब जीभ फिराता हूँ
स्वाद आते हैं
तुम्हारी बतकही के
कितना मादक  है
तुम्हारे शब्दों को यूं
मिसरी की तरह उतारना
अपने भीतर

बरसाती अंधेरी रातों में
जब मैं घूमता हूँ
आवारा शहर की
काली चमकती सड़कों पर
ये तुम्हारे ही शब्द  हैं
किसी बौद्ध भिक्षुणी के से
जो बुदबुदाते हैं मेरे होठों से
विरह और मोहभंग की
लंबी रात को छोटी कर जाते हैं
तुम्हारे अनकहे ये शब्द
उच्चरित होकर अस्फुट
मेरे होठों पर

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