अर्पण कुमार की 5 कविताएं

अर्पण कुमार

दो काव्य संग्रह ‘नदी के पार नदी’ (2002), ‘मैं सड़क हूँ’ (2011) एवं एक उपन्यास ‘पच्चीस वर्ग गज़’ (2017) प्रकाशित एवं चर्चित। कविताएँ एवं कहानियाँ, आकाशावाणी के दिल्ली, जयपुर एवं बिलासपुर केंद्र से प्रसारित। दूरदर्शन के ‘जयपुर’ एवं ‘जगदलपुर’ केंद्रों से कविताओं का प्रसारण एवं कुछ परिचर्चाओं में भागीदारी। कई कहानियाँ एवं आलोचनापरक आलेख महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

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1. विलुप्त होता प्रेम

नदी अकेली

नहीं चाहिए

और चीज़ों के साथ

नदी भी चाहिए

और चीज़ें मिल जाती हैं

नदी आगे निकल जाती है

या कभी पीछे छूट जाती है

और चीज़ें साथ चलती है

नदी के सिवा।

2. लड़की

नदी नई भाषा

जल्दी सीखती है

नई भाषा में

नदी जल्दी बहती है।

3. संकोच

मैं आता दिखा

नदी ठिठक गई

मैं आ पाता

नदी आगे बढ़ गई।

4. उलझन

मुझको लेकर हमेशा

असमंजस में रही नदी

तब

जब साथ थी

और आज भी

जब वह दूर है।

5. कंपायमान प्रेम

मैं सहम जाता हूँ

और वह काँप जाती है

जब भी मिलना हुआ

नदी से

ऐसा ही हुआ।

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