आरती आलोक वर्मा की 3 ग़ज़लें

आरती आलोक वर्मा

एक

लगाई  उन्होंने  ही  आग  घर में 
बसाये हुये थे जिन्हें हम नजर में  

घरौंदे बिखरते नजर आ रहे हैं 
 नये दौर के इस अनूठे शहर में
चमन में पसरने लगी आग हरसू 
शरारे दिये छोड़ किसने शज़र में ।
जहाँ मुफलिसी बसर कर रही हो
वहाँ कौन जीता नहीं डर फिक्र में 
किसी राह पर ‘आरती “वो मिलेगा
अभी आज गुम है जो अपने सफर में 

दो

मुझको आपा खोने दो
दिल को पागल होने दो 

गम की बारिश होने दो
काजल मुझको धोने दो 

आंसू झम-झम बरसेंगे 
आंखे बादल होने दो 

इन पलकों की छांव तले
मुझको हर पल सोने दो 

सब  तेरी  बातें  मानू 
ऐसे जादू- टोने दो 

हसरत जाने कब से मरी
लाश वफा की ढोने दो 

तीन

बढ़ गई है अजी तिश्नगी आजकल
बह रही है यहाँ इक नदी  आजकल

खून से सींच रिश्ते रहे थे सभी
रह गये वो कहां आदमी आजकल 

पास गम आ गये दूर खुशियां हुईँ 
है अता ये मुझे जिंदगी आजकल

आपकी जिंदगी रौशनी में रहे
लिख रही दास्ताँ चांदनी आजकल 

वो निगाहें किसी चांद से कम नहीं 
दे रही जो मुझे रौशनी आजकल 

एक तुम मिल गये जिंदगी मिल गई 
रह गई न कोई अब कमी आजकल 

लोग क्योंकर भला साथ दे “आरती”
पास है जो तिरी मुफलिसी आजकल 

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