आरती आलोक वर्मा की तीन रचनाएं

चुप चुप  ऐ दर्दे गम
चुप चुप ऐ दर्दे गम, कोई देख ना ले
छुप छुप ऐ बहते नयन कोई देख ना ले
घुट घुट के सीने में है जो दफन,
ऊफ् ऊफ् ऐ मौत सरीखा जलन,
चुप चुप ऐ जलते जख्म कोई देख ना ले।।

मुस्कान की सूरत में अश्क छुपाए जा तू
खामोशी की चादर में सिसकियां दबाये जा तू
जीवन है गम का गीत मगर फिर भी गाये जा तू
कर कोई उपाय, कोई भी कर तू जतन
राज न कह पायें बेबस ,बेकल नयन
चुप चुप ऐ रिसते गम कोई देख ना ले।।

 

हाय जिन्दगी !
कभी आहा तो  कभी आह जिन्दगी
कभी आबाद , कभी तबाह जिन्दगी

कहीं मंजिल तो कहीं राह जिन्दगी,
कभी धवल ,कभी स्याह जिन्दगी

कभी शब तो कभी सबाह जिंदगी
कभी नफ़रत कभी रस्मो राह जिंदगी
तेरी   मैं   हूं ,  मेरी    तू
चाहे जिस तरह से निबाह  जिंदगी
अपने मिलन की बात
अभी मगर हैं तोड़ने वाले ताकतवर वो हाथ
एक दिन ऐसा आएगा जब बदलेंगे हालात
कभी तो ऐसा दिन आएगा ,आएगी वो रात
इस धरती की अंबर से हो जाएगी मुलाकात
दीप से ज्योति,सीप से मोती डोर पतंग साथ
इनसे भी बढ़कर है अपने  मिलन की बात
फिरता हूं मैं मारा -मारा बनके बादल बर्बाद
तुम मिल जाओ तो कर दूं झमाझम बरसात ।।

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