आरती कुमारी की पांच कविताएं

वह लड़की

आती है रोज
गन्दे बोरे को
अपने कांधे पर उठाए
‘वह’ लड़की’
और चुनती है
अपनी किस्मत-सा
खाली बोतल, डिब्बे और शीशियां
अपने ख्वाबों से बिखरे
कुछ कागज के टुकडा़ें को
और ठूंस देती है उसे
जिंदगी के बोरे में

गरीबी की पैबन्दों का
लिबास ओढ़े
कई पाबन्दियों के साथ
उतरती है
संघर्ष के गन्दे नालों में
और बीनती है
साहस की पन्नियाँ
और गीली लकड़ी-सा
सुलगने लगती है
अन्दर ही अन्दर
जब देखती है
अपनी चमकीली आँखों से
स्कूल से निकलते
यूनिफाॅर्म डाले बच्चों को!

स्वयं से संवाद
कितना सुखद होता है
अपने होने को महसूस करना
और प्यार करना खुद को।
अलग-अलग रिश्तों में बँटकर
जैसे बँट जाती हूँ मैं ही कई हिस्सों में।
दूसरों की खुशी में कई बार घुलती मैं, जैसे अनचीन्हीं
अनजान हो गई हूँ अपने ही अस्तित्व से।
मगर तभी कहीं सुदूर एकान्त में
कोई गा रहा होता है
स्नेहिल शब्दों का मधुर गीत
जहाँ सालों भर खिलते हैं फूल
जहाँ हमेशा गूँजता रहता है
कल-कल झरनों का संगीत
जहाँ नदियाँ अठखेलियाँ करती हैं नौकाओं के साथ।
जहाँ सूरज अपनी किरण बाँहे फैलाए
पुचकारता रहता है पेड़ पौधोें को हमेशा
जहाँ रात होते ही रुपहली चाँदनी ढंक लेती है
सबकुछ अपने आगोश में।
आखिर कौन है, जिसने अपनी साँस की लड़ियों में
पिरोये हैं सुमधुर गीतों के शब्द।
वहाँ कोई दूसरा नहीं
पेड़ पौधें, , नदी झरनों
और सूरज चन्द्रमा के साथ थिरक रहा है
मेरा अपनी ही अस्तित्व
उस नीरव एकान्त में।

 दिन
हर रोज की तरह
आया एक और दिन
कुछ भी तो विशेष नहीं लाया
न किसी के आने का समाचार
और ना किसी शुभ-अशुभ
घटना का संकेत ही
सब कुछ यथावत यंत्रवत
कट जाएगा
इस दिन का भी हर पल
रसोई घर में
चाकू छूरियों के साथ से
खोखली बातों की आरियों से
कुचली जाएगी हर घड़ी
चलती बस के पहियों के नीचे
अगणित लोगों के बोझिल
पाँव तले
और
निकल जाएगा यूं ही
एक दिन औरं

 क़ैद
तुमने न जाने क्या सोचकर
मुँह फेर लिया
और बंद कर लिए
अपने हृदय के कपाट
मेरे लिए
पर मेरी मासूम-सी चाहत ने
हार नहीं मानी
कभी तुम्हारी आँखों की खिड़कियों से झाँक
तुम्हारे प्रत्युत्तर का
इंतजार करती रही
तो कभी
शब्दों की सीढ़ी के सहारे
तुम्हारे दिल के आंगन में,
उतरने को प्रयासरत रही,
पर न तुमने
अपनी जिद छोड़ी
ना मैंने अपनी चाह
कितना भी छुपाना चाहो,
नहीं बच सकते
कैद
कर लिया है मैंने तुम्हे
अपनी यादों में…
और तुम्हारी भाव-भंगिमा,
आचार-विचार एवं शब्दों को
अपनी रचनाओं में
जिनसे जब चाहूँ मिल सकती हूँ मैं
बिना किसी प्रत्युत्तर की प्रत्याशा में..
फिक्सड लाइफ

माॅल के बनते ही
बाजार सिमट गया है एक जगह
अब न रही वो चहल-पहल
न खोंमचे ठेले की आवाजाही
और न ही आवाजें तोल मोल की
न मेला, न ठेला और न ही
हँसी ठिठोली की गूँज
अब तो हर जगह है फिक्सड प्राइस
फिक्सड बातें और सबके चेहरे पर चिपका
फिक्सड एक्सप्रेशन
ए.सी. हवा के बीच
लोगों के छूटते पसीने
पुराने को छोड़ नवीन को
अपनाने की होड़।
माॅल की तरह हम भी तो
आधुनिक बनने के चक्र में
समाज से अलग-थलग होकर रह गये है,
घरों से अपने कमरों तक में
सिमट से गये हैं
फिक्सड सेन्टीमेंटस और
फिक्सड इमोशन्स के साथ!

 

———-
आरती कुमारी
जन्मस्थान–गया
शिक्षा–एमए  एम एड, पीएच-डी.
सृजन
प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में गीत, गज़ल, कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित तथा दूरदर्शन से रचनाएँ प्रसारित
कृति
कैसे कह दूँ सब ठीक है ;पहला कविता-संग्रह प्रकाशितद्
संपर्क
द्वारा – श्री ए एन पी सिन्हा
शशि भवन, आजाद काॅलोनी, रोड- 3,
माड़ीपुर, मुजफ्फरपुर- 842001

You may also like...

3 Responses

  1. मिर्ज़ा हफीज़ बेग says:

    कविताओं मे कमाल की संवेदनशीलता देख प्रसन्नता हुई । ये कवितायें आज के दौर मे नायाब हैं ।

  2. Raxit says:

    All the poems are really very nice
    may I Translate all of them in Gujarati? Your permission is necessary..

  3. Bp says:

    Very Heart touching words by author KAaartii

Leave a Reply