आरती कुमारी की दो कविताएं

आरती कुमारी

जन्म तिथि:  25 मार्च, 1977

पता:  द्वारा - श्री ए. एन. पी. सिन्हा,  शशि भवन, आजाद काॅलोनी, रोड- 3,  माड़ीपुर, मुजफ्रपफरपुर- 842001,'

शिक्षा: एम.ए. अंग्रेजीद, एम.एड, पीएच-डी.

व्यवसाय: सहायक शिक्षिका के रूप में राजकीय उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय, ब्रह्मपुरा, मुजफ्रपफरपुर में  पदस्थापित। 

प्रकाशन : कैसे कह दूँ सब ठीक है (काव्य संग्रह),  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

  1. तुम मनुष्य बने ही कब ?

तुम मनुष्य बने ही कब ?

पहले बंदरों की तरह

इस डाल से उस डाल

उछलते रहे

कभी पूँछ से लपेटा

हाथों से झपेटा

दाँत गड़ाए, मुँह चिढ़ाए

और फिर चल दिए किसी दूसरी डाल पर 

अब तो प्रगति कर

कई जानवरों के गुण ले लिए हैं तुमने

हाड़-माँस दिखा नहीं

कि लार टपकने लगती है तुम्हारी।

गिद्ध की तरह आँखों से ही

नोचना शुरू कर देते हो तुम 

अपने पंजों से प्रहार कर

क्षत-विक्षत कर दी है आत्मा तुमने

भेड़िए की तरह टूट पड़ते हो

अपने शिकार पर कभी भी

जब तुम्हारा जी चाहता है

मगरमच्छ की तरह

साबूत हीं निगल जाते हो तुम

और पीसते रहते हो चक्रव्यूह में अपने

फिर गिरगिट की तरह रंग बदल कर

ऐसे जताते हो जैसे कुछ हुआ ही न हो ।

काश! कोई माँ

न जनती तुझको

दया, करूणा, स्नेह, ममता से

न सींचती तुझको

बेटे की चाहत में वह भूल गई

कि जन्म दे रही है

एक हैवान को

जो उसके ही अस्तित्व के लिए

एक खतरा बन गया है।

नोट- नैंसी घटनाक्रम पर

2. खामोशी

रिक्तता से भरा ये जीवन

पुलकित हो उठा था

तुम्हारे आने की

आहट मात्र से ही

ख्वाहिशें.. धड़कनों के हिंडोले पर

मारने लगी थी पेंग

उमंगे ...

मचलने लगी थी

ले लेकर अंगड़ाइयाँ

और

सपनों के रोशनदान से झांकती

तुम्हारे प्यार के उष्मा की नरम किरणें

जगाने लगी थी

सोये हुए अरमानों को मेरे

पर

बढ़ती उम्र ने

लगा दिए है सांकल

दिल के दरवाजे पर

और ठिठका दिया है

तुम्हारी यादों को

कहीं दूर

बंद कर दिये है तजुर्बे ने

चाहत की वो सारी खिड़कियाँ

जिससे तैरकर

उतरने लगी थी मेरे भीतर

तुम्हारी खुशबू

और समझदारी ने

कर दिया है

उदासी और घुटन के

घुप्प अंधेरे में जीने के लिए विवश

एक लंबी खामोशी के साथ.. । 

You may also like...

Leave a Reply