आरती तिवारी की तीन कविताएं

आरती तिवारी

छाले

माँ आँतों में छाले पाले
जाने कैसे जीती रही बरसों
हथेली में उगाती रही सरसों

हम रहे अनभिज्ञ
उसकी खामोश कराहों से
दर्द फूलता रहा खमीर सा
वो चढ़ाये रहती
खोखली हँसी की परतें

माँ का जिन्दा होना ही
आश्वस्ति थी,हमारी खुशियों की
हमारे लिए ही वो
पूजती रही शीतला
करती रही नौरते
भूखी,प्यासी जागती रही सारी सारी रात

और हम जान ही नही पाये
अनगिनत रोटियाँ बेलती माँ की
सूखी हंसी,पपड़ाये होंठों के राज़
उसकी गुल्लकें जो
कनस्तरों में,बिस्तरों की तहों में
सुरक्षित और सुनिश्चित करती रहीं
हमारा उजला कल
उगल देती हर बार एक किश्त
हमारे सपनों के लिए
..जब जब भी बाबा हताश हुए

दिन रात सुबह शाम
पृथ्वी सी,अपनी धुरी पे घूमती
रचती रही,मौसमों के उपहार
हमारे लिए

माँ के आशीष पनपते रहे
फूलते रहे,फलते रहे
बनती रही परिवार की झाँकी
कभी चाह और कभी डाह की बायस
माँ जोड़ती रही,तिनका तिनका
हमारे लिए

और खुद रिसती रही बूँद बूँद
दर्द के ज्वार को समेटती रही
ठठा के हंसने मेंं
हम कौतुक से देखते
उसकी रुलाई रोकती हँसी
और फिर भूल जाते
हम नहीं देख पाये
माँ के अंतर को कोंचते
आँतों के छाले
छले गए उस छलनामयी की
बनावटी हंसी से….

हरियाली तीज

वे स्त्रियाँ,जो नही जानतीं
क्या होता है वाटर पार्क
जिन्होंने कभी नहीं देखे मल्टीप्लेक्स
मॉल में रखे क़दम कभी नहीं
वे स्त्रियाँ और बच्चियाँ जो
घिरी रहीं गोबर और कीचड़ के घेरों के बीच

उनकी सुबह जो चूल्हे की धुंआती चाय से शुरू होके
दिन भर कमर तोड़ मेहनत से गुजरती हुई
शाम के धुंधलके में समाती गई

उनके लिए तो ये हरियाली तीज
ये झूलों की पींगें आमोद प्रमोद की
मधुर बांसुरी है

ये वे ही शापित अहिल्याएं हैं
जो सावन की फुहारों में भीग/पत्थर से
स्त्रियों  में बदल जाती हैं।
आता है भैया लिवाने तो खिल उठती हैं
तुरन्त रचाने बैठ जाती हैं महावर
बरसों से बिछुड़ी सखियों से मिलने की आस
सूखी त्वचा को भी कोमल बना देती है

भावज की मनुहार, माता की ममता
पिता का माथे पे रखे काँपते हाथ से बरसता दुलार
साल भर के जीने का हौसला/सौगात में मिला मानो
फुदकती हैं आँगन में तो गौरैया सी
चहचहाहट बिखर जाती है

कैसे कह दूँ कि  मेरे लिए नहीं हैं मायने
इन तीज त्यौहारों के
सखी सुनो,ये नहीं गईं कभी यूनिवर्सिटी

इन्होंने नहीं पढ़े रिसर्च पेपर
ये कभी नहीं देखेंगीं हॉलीवुड मूवी
ये नहीं जान पायेंगी कि चाँद
उपग्रह है पृथ्वी का
इनके लिए तो ये मेले ठेले  ये पर्व उपवास
मिलने जुलने और साधन हैं
आमोद प्रमोद के
इनकी होठों की सहज मुस्कान
जीने देतीे हैं इन्हें
खुल के खुली हवा में
चन्द रोज़ ही सही जी तो लेती हैं
सिर्फ अपने लिए बहाना कोई भी हो।।

विदा होती लड़की

देहरी से नीचे रखते हुए
महावर रचे पांव
ख़ुरचती है नाखूनों से
अपनी कसैली यादें
जो बाद में कड़वी न कर दें
स्मृतियों की मीठी चाय
जब भरे जायेंगे घूँट
उसे सोचते हुए निराले में

चुंदड़ी में लगाती जाती है एक गाँठ
जिसमे अबेर लेना चाहती है
भैया का नेह अक्षत के दानों में
ताकि बनी रहे पीहर बाट

माँ के आंसुओं का ओर छोर न पाकर
हिचकियों में उतारती चलती है
घुट्टी में चटाई सीखें
अखण्ड खुशहाल परिवार की
कौली भर के लौटाती है हौसला
अम्मा हार मत जाना
हिम्मत की लड़ाई

गमले के उदास फूल
निहारतें हैं भरी आँखों से
पास रखा हजारा,छोड़ना चाहता है फुहारें मोहब्बत की
कि लौटकर आना लली

आरती की लय,घंटियों में मिल
बजाती है मानो विदाई की शहनाई
बाबुल के गले से लिपटी
बिटिया के गहने फफक फ़फ़क के
गुंजा देते हैं गांव के चौबारे
उतर आये हैं,मेंहदी के सुर्ख रंग
बाबुल की आँखों में
कि लाड़ो बिसरा चली
अंगना बाबुल का

गाड़ियों के काफिलों के साथ
चल पड़ा है,एक सुहाना वक़्त
हो रही है विदा,एक कुंआरी खिलखिलाहट
सुहाग की नयी गन्ध में बदल
पीछे उड़ता धूल का गुबार
किसी ज़गह सहेज देना चाहता है
यादों की पोटली
कि बिटिया तो विदा हो गई।
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आरती तिवारी

लगभग 15 वर्ष तक अध्यापन के बाद फिलहाल स्वतंत्र लेखन। -विगत 15 16 वर्षों से मध्य-प्रदेश के प्रमुख समाचार पत्रों में विभिन्न विधाओं पे रचनाएँ प्रकाशित।आकाशवाणी इंदौर से कविताओं का प्रसारण। अब तक कई सम्मान मिल चुके हैं। आरती का पता है

DD/05 चम्बल कॉलोनी मन्दसौर 458001 म प्र

ईमेल–arti.tiwari15@yahoo.com

 

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