अरुण कुमार की 5 कविताएं

  1. क्या है जिन्दगी?


जिन्दगी
पायजामे के उस नाड़े सी है
जिसे, जितना जल्दी सुलझाना चाहता हूं,
उतनी ही उलझती चली जाती है।
जिंदगी
शहर के, उस ट्रेफिक जाम जैसी है
कि जब दौड़ना चाहता हूं,
फंस सी जाती है।
जिंदगी
गांव के छोर की उस अंतिम बस्ती सी है,
जो कभी भी सुलगा दी जाती है,
और मैं जल सा जाता हूँ।
जिंदगी
उन अधूरे सपनों सी है
जो रोटी पाने की लालसा में
भूखे कुत्ते सी झपट पड़ती हैं, झूठन पर।
जिंदगी
दलित बस्ती की युवती के यौवन सी है
जिसे समाज में घूमते हुए गिद्धों की ललचाई नजरें
अपनी हवस का शिकार बना देना चाहती है।
जिंदगी
समाज में फैली गंदगी सी है
जो सीवर को साफ करते करते
अव्यवस्था की भेंट चढ़ जाती हैं।
जिंदगी
पीपल के उस पुराने पेड़ सी है
जो अपनी छांव में, जातिवाद के पोषकों के
अनगिनत गुनाहों को समेटे है।

2. खामोश कलम

आज फिर से
कुछ लिखना
चाहती है,
कलम
सोचा लिखूं
प्रेम में संयोग के उन पलों को
जब चाय की चुस्कियां लेते हुए
दोनों
मुस्कुरा उठते थे
एक दूसरे को देखकर
नहीं-नहीं,
फिर सोचा लिखूं
प्रेम में वियोग की उस पीड़ा को
जिसका साझीदार
आज तक नहीं बनाया
कभी किसी को,
नहीं-नहीं,
फ़िर से सोचा लिखूं
देश में बढ़ती हुई
बलात्कारी संस्कृति पर
दुधमुंही बच्ची से वयोवृद्ध महिला
सोचा लिखूँ
अलवर से अकबर, पहलू खान
शांत अलवर से सुलगता अलवर
गौ रक्षण से मानव भक्षण
सोचा लिखूं
सवर्ण से दलित
गहरी होती खाई जाति धर्म की
ब्राह्म्णवाद की भेंट चढ़ते
दलित बहुजन
सोचा लिखूं
अंतहीन बहसों में आकंठ डूबा मीडिया
चलते हुए लात घूंसे
गोदी पत्रकारिता
सोचा लिखूँ
संविधान को पैरों तले रौंदते फतवे
भीड़तंत्र में बदलता लोकतंत्र
पूंजीवाद के खिलौने बने सफेदपोश
नहीं नहीं
सुना है
जो उठाते हैं
खतरे अभिव्यक्ति के
उन्हें मार दी जाती हैं
गोली,
जाने क्यूँ
आज फिर मेरी
कलम खामोश हैं।।।।।

3. मेरी आवाज

हाँ,
मैं दलित हूँ
सदियों से
तुम्हारे शोषण का शिकार
प्रताड़ित, उत्पीड़ित
दबाया गया, रौंदा गया
पीड़ा का दंश झेलते
कुचल दी गई, मेरी आवाज
मगर
मेरी मूक अभिव्यक्ति
आज फिर से
कुछ कहना चाहती है
और फिर
तुम दबा देना चाहते हो
मेरी आवाज
नहीं देना चाहते
हक
मुझे, मेरे इंसान होने का
एक प्रश्न पूछू?
मेरी आवाज से तुम
इतना क्यूँ डरते हो?

4. चेतना

तुम
जो कभी मिर्चपुर जलाते हो
कभी सहारनपुर, शब्बीरपुर धधकाते हो
हाँ, तुमसे
सिर्फ तुमसे
मैं कहना चाहता हूं
कब तक
आखिर कब तलक
तुम
अपनी झूठी उच्च वर्ण, मानसिकता बचाने को
जलाओगे
मारोगे
काटोगे
वहशी दरिंदों सा
व्यवहार करोगे,
एक दिन
भीम की गर्जना में
धूं धूं कर जल उठेंगे
तुम्हारे मनुवादी शीशमहल
बस, जरा हमें
चेतन हो जाने दो।।

5. आस्थाहीनता

कल देखा मैंने
आस्था का घिनौना रूप
रामेश्वरम में,
महाशिवरात्रि के दिन
हजारों लीटर दूध बहा
शिवलिंग पर, आस्था के नाम पर
मगर
मंदिर के बाहर
दूध के लिए बिलखते
बालक पर, नहीं पड़ी निगाह
करुणा आंखों में लेकर
मां मांगती रही थोड़ा दूध
मगर इंसानियत से हीन
लाखों लोगों का
नहीं पसीजा कलेजा,
वो तो बस धुन में थे
दूध चढ़ाने की,
और तभी समझ आया कि
क्यों भारत में दूध की नदियां बहती थी?
भगवान् के भोग के नाम पर
हम बहा सकते हैं लाखों लीटर दूध
हजारों लोगों का भोजन
मगर, भर नहीं सकते
किसी गरीब का पेट,
अगर ऐसा होता, तो
मेरे देश की तस्वीर कुछ और होती?

अरुण कुमार
पूर्व उप संपादक – युद्धरत आम आदमी
मगहर पत्रिका के थर्ड जेंडर विशेषांक के अतिथि सम्पादक
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कविताएं प्रकाशित.
दलित साहित्य : चुनौतियाँ एवं चिंतन, संपादित पुस्तक प्रेस में

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