अरुण कुमार की 4 कविताएं

अरुण कुमार
  1. विचार

विचारशून्य नहीं था मैं,

सदियों से कौंधते रहे

मेरे मन में,

विचार

तुम्हारी मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ,

मगर

मेरे शब्दों को

दबा दिया गया

हजारों वर्षों के

शोषण में,

अछूत कहकर

कुचल दिया गया

मेरे वजूद को,

ब्राह्मणवादी संस्कारों ने

और थमा दिया गया

झुनझुना मुझे

जाति और धर्म का

ताकि मैं

अभिव्यक्त ना कर सकूं

अपने विचार।

 

2. कठपुतलियां

 

अपने ही धागों में

उलझी हुई कठपुतलियां,

सत्ता के शोषण तंत्र में

उलझी सी कठपुतलियां,

तलाश रही है अपना वजूद,

अपनी अस्मिता,

अपनी पहचान।

वर्षों तक मनोरंजन के सागर में

जिन्होंने लगवाई भी डुबकियां,

तकनीक के दौर में, आज

खोने लगी हैं अपनी पहचान।

तभी तो

कठपुतली कॉलोनी

आ गई सत्ता के

निशाने पर,

भ्रष्ट तंत्र में नहाए बुलडोजर,

रहेजा के नशे में डूबी खाकी,

ढहा रहे थे कहर,

बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं

बेबस थे सरकारी लाठी के आगे,

उनका करूण स्वर, उनकी चीत्कार

दब गए थे सरकारी कोलाहल में,

सत्ता और पूँजीवाद के,

भ्रष्ट गठजोड़ ने

नंगे नाच ने,

पल में ही धराशायी कर डाले

मकान आशाओं के,

महल सपनों के।

पसरा हुआ था मलबा वहाँ

जीवन की उमंगों का,

समेट रही थी कठपुतलियां

मलबे के ढेर में

बचे खुचे जीवन को।

शासन के इस करतब पर

 हँस रहे थे लोग,

और रो रही थी

कठपुतलियां।

 

3. सवाल

अक्सर

यमुना के पुल से गुजरते हुए

दूर क्षितिज के किसी कोने में

जब पंक्तिबद्ध पक्षियों को,

और उनके अनुशासन को

देखता हूँ,

तो सोचता हूँ, कि क्यों

ये अनुशासन

हमारे मानवीय समाज में नहीं

प्रकृति की दुनिया में

ना कोई सवर्ण है

ना कोई अवर्ण,

न कोई ऊंच नीच

ना कोई अछूत

ना कोई दलित

जाति, धर्म, मजहबी लड़ाइयां भी

उनके समाज का हिस्सा नहीं।

मगर मानवीय समाज?

जातीय दंभ से भरे युवक,

लट्ठ भांजते हैं दलितों पर,

नंगा कर घुमाते हैं, गाँव भर में

दलितों को।

मनुवादी व्यवस्था के उच्च पायदान पर बैठे, भूखे भेड़िये

नोच डालते हैं, जिस्‍म

दलित युवतियों के,

क्योंकि महिला का शरीर

अछूत नहीं होता?

मानव की मानव पर

हिंसा से भरा समाज,

नहीं सीखता कुछ

प्रकृति के अनुशासन से।

ऐ मनुवादियों की संतानों,

सुनो

संभल जाओ,

वरना

बाबा साहब के वैचारिक

जल प्रलय में,

नहीं बचेगा, कोई मनु।

 

4. इश्क

आज वो टूटना चाहते हैं

और मैं बिखरना,

पर, ये इश्क है ना

ना टूटने देता है

ना बिखरने

लौट आओ

इन ख्वाबों में

कि तन्हा रातें

अक्सर

नींद से जगाकर

तुम्हारा पता पूछती हैं

 

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